सानिया की शादी से 'सीख लेनी होगी'

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टेनिस स्टार सानिया मिर्ज़ा तेलंगाना राज्य की ब्रांड एम्बैसडर क्या बनीं, भारी विवाद हो गया.

भारतीय जनता पार्टी के एक विधायक ने उन्हें पाकिस्तान की बहू बताते हुए कहा कि वे इसके लायक नहीं हैं. उनके हैदराबाद से जुड़ाव पर भी सवाल उठे.

इससे आहत सानिया ने यहां तक कह डाला कि उन्हें कितनी बार अपनी भारतीयता साबित करनी होगी.

ये विवाद अब थम चुका है, लेकिन कई सवाल अपनी जगह बने हुए हैं.

पढ़िए ये आकलन विस्तार से

हैदराबाद में भारतीय जनता पार्टी के एक नेता ने फरमान जारी किया- भारत की सबसे बड़ी महिला टेनिस खिलाड़ी और लाखों दिलों की धड़कन सानिया मिर्ज़ा तेलंगाना की ब्रांड एम्बैसडर बनने के योग्य नहीं हैं. क्यों?

उनके मुताबिक क्योंकि सानिया पाकिस्तान की बहू हैं.

यह बेहद दुखद है कि कुछ धर्मांध हिंदुओं की नज़रों में पाकिस्तान से किसी तरह के संबंधों के चलते किसी की भारतीयता कम हो जाती है.

सानिया ने इसके बाद एक टीवी साक्षात्कार में नम आंखों के साथ पूछा, "मुझे अपनी देशभक्ति कितनी बार साबित करनी होगी?"

सानिया ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि उन्हें ना केवल हैदराबादी होने पर गर्व है बल्कि उन्हें भारतीय होने का भी गर्व है.

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सानिया ने कहा, "मैं एक भारतीय हूं और ज़िंदगी भर भारतीय बनी रहूंगी." सानिया हमें आप पर गर्व है.

भारतीय जनता पार्टी के नेता ये भूल गए कि सानिया पाकिस्तान की बहू बनने से पहले भारत की बेटी थीं, जो वह हमेशा रहेंगी.

भारतीय संस्कृति हमें अपनी बेटी को प्यार, सम्मान और देखभाल करना सिखाती है, भले ही शादी के बाद वह अपने सुसराल में क्यों ना रह रही हो.

दामाद बाबू शोएब

इस ग़ैर ज़रूरी विवाद ने भारत और पाकिस्तान में मौजूद सानिया और उनके प्रशंसकों को निराश किया. हालांकि दूसरी ओर, इस विवाद ने भारत और पाकिस्तान के बीच मेल-मिलाप के संकेत दिए हैं.

आम तौर पर, कोई सोच सकता है कि पाकिस्तान के पूर्व कप्तान शोएब मलिक से शादी करने के बाद सानिया, शोएब के माता-पिता सुल्ताना और मलिक फ़कीर हुसैन की बहू बनी हैं. ऐसे में उन्हें 'पाकिस्तान की बहू' किस आधार पर कहा जा रहा है?

दरअसल दक्षिण एशिया में ये पुरानी परंपरा रही है कि जब बेटी का ब्याह होता है तो उसका रिश्ता ना केवल अपने पति और पति के परिवार से जुड़ता है बल्कि अपने सुसराल के गांव और शहर की भी वह बहू कहलाती है. इससे उस गांव और शहर पर भी बहू की देखभाल की ज़िम्मेदारी आ जाती है.

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ठीक उसी वक्त, शादी के बंधन से सदभाव का नया संबंध बनता है, जिसमें पति अपने सुसराल वालों का ही दामाद नहीं रह जाता, वह उस गांव और शहर का भी दामाद हो जाता है, जहां से उसकी पत्नी होती है. सानिया से विवाह करके शोएब भारत के दामाद बन गए हैं. ऐसे में सानिया और शोएब भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों के संकेत हैं.

दक्षिण एशिया के प्राचीन इतिहास में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के दूसरे समाज में ऐसे ढेरों उदाहरण हैं जिसमें शादी के जरिए परिवार, गांव, साम्राज्य और यहां तक कि देशों के आपसी संबंधों में सुलह देखने को मिली है.

ईसा से चार शताब्दी पूर्व, सिकंदर महान ने ईरान पर आक्रमण करने के बाद अपने दस हज़ार अधिकारियों को ईरानी युवतियों से शादी करने का निर्देश दिया था ताकि यूनानी और ईरानी लोग आपस में नजदीक हो सकें.

परिवारों में हो मेल-जोल

यह स्पष्ट है कि सानिया और शोएब ने आपसी प्रेम के चलते शादी की. उन्होंने शांति वार्ता मिशन को बढ़ाने के लिए शादी नहीं की है.

ऐसे में मेरा विश्वास है कि भारतीयों और पाकिस्तानियों के बीच ज़्यादा से ज़्यादा शादी होनी चाहिए. दक्षिण एशिया के युवक-युवतियों के बीच भी शादी होनी चाहिए. इसके जरिए आने वाले समय में, सीमा पार परिवारों में एकता स्थापित होगी. जब परिवारों में एकता होगी, तो देश भी नजदीक आएंगे.

भारत और पाकिस्तान के मामले में तो इसकी ज़रूरत ज़्यादा है ताकि 1947 के विभाजन में अलग हो चुके परिवारों को फिर से एक होने का मौका मिले. इन परिवारों को दुखद विभाजन के बाद एक होने का मौका नहीं मिला है.

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ब्रितानी शासन के ख़त्म होने के बाद भारत और पाकिस्तान का ख़ूनी विभाजन हुआ था जिसमें पाकिस्तान में रह रहे लाखों हिंदुओं और सिखों को पलायन करना पड़ा. ठीक उसी तरह से, भारत से लाखों मुसलमान परिवारों को पाकिस्तान जाना पड़ा था. यह मानव इतिहास में सबसे बड़ी आबादी का पलायन था.

1947 के बाद, बहुत कम हिंदू और सिख परिवारों को पाकिस्तान में अपने घर और शहर जाने का मौका मिला. ठीक उसी तरह पाकिस्तान में बसे चुनिंदा मुसलमान ही भारत में अपने रिश्तेदारों से मिल सके.

यह पीड़ा हिमालय जितनी विशाल है. जो लोग भारत में पाकिस्तान को बदनाम करते हैं या फिर पाकिस्तान में भारत को बदनाम करते हैं या फिर भारत और पाकिस्तान के बीच किसी संबंध को संदेह से देखते हैं, उनके पास दिल नहीं है. उन्हें इन दो देशों के उन हज़ारों मुसलमानों और हिंदू परिवारों का दर्द महसूस नहीं होता.

आपसी सहयोग की जरूरत

यही वजह है कि इस साल जून में इस्लामाबाद में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई एक ग़ैर आधिकारिक वार्ता में मैं 13 अन्य भारतीयों के साथ शामिल हुआ जहां हम लोगों ने एक संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया.

इसके मुताबिक़ दोनों देशों के लोगों के बीच संबंधों को मज़बूत करने के लिए तत्काल सभी कदम उठाने चाहिए. ख़ास तौर पर, विभाजन का दंश झेल रहे परिवारों में मेलजोल बढ़ाने के लिए वीज़ा देने की प्रक्रिया को आसान बनाना चाहिए.

दुखद यह है कि पाकिस्तान के साथ किसी तरह का संबंध होने पर भारत में उसकी राष्ट्रीयता पर सवाल उठा दिया जाता है. भले वह सानिया मिर्ज़ा की शादी की बात हो या फिर दोनों देशों के बीच किसी तरह की शांति वार्ता की कोशिश हो.

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कई लोग ट्विटर पर मुझे पाकिस्तान वापस जाने की सलाह दे रहे थे जब उन्हें मेरे उस सेमिनार में भाग लेने का पता चला, जिसे वे ग़लती से आईएसआई प्रायोजित सेमिनार कह रहे थे.

दरअसल इस बात की तुरंत जरूरत है कि भारत और पाकिस्तान अच्छे पड़ोसी की तरह रहें और आम संबंधों में आपसी सहयोग बढ़ाएं.

भारतीयों को परिवार के लोगों से मिलने, कारोबार, खेल और पर्यटन के लिए पाकिस्तान जाने की इजाजत होनी चाहिए और यही सुविधाएं पाकिस्तानी को भारत आने के लिए भी होनी चाहिए.

जब ऐसा होगा, तब भारत और पाकिस्तान का प्रत्येक नागरिक अपने-अपने देश का ब्रांड एंबैसडर होगा जो शांति, सदभाव और हमारी सभ्यता के एका का संदेश प्रचारित कर रहा होगा.

(लेखक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सहायक रहे हैं और भारतीय जनता पार्टी के थिंक टैंक में रह चुके हैं)

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