'जब मैं लौटी तो वहां कुछ भी नहीं था'

विठाबाई, मालीण गाँव

पुणे के मालीण गाँव की रहने वाली विठाबाई सावड़े एक ख़ुशक़िस्मत महिला हैं. बुधवार की सुबह वो अपने खेत में काम करने घर से निकलीं थी कि अचानक पहाड़ से मिट्टी का मलबा गिरने लगा और देखते ही देखते लगभग पूरा गाँव मिट्टी के अंदर दब गया.

सावड़े का घर से उस समय निकलना उनके जीवन की सबसे अहम घटना साबित हुई.

मलबे के ढेर तले उसके कई पडोसी दब गए लेकिन वो बच गईं.

सावड़े ने मुझे बताया, "मैं घर से जब खेत के लिए निकली तो सारा गाँव मौजूद था लेकिन जब मैं वापस लौटी तो वहां कुछ भी नहीं मौजूद था."

इस तरह के अनुभव का सामना और भी लोगों ने किया. आगे विस्तार से पढ़िए पूरी रिपोर्ट.

'..और अंधेरा छा गया'

सावड़े से भी भाग्यशाली थी 25 वर्षीय प्रमिला जो अपने तीन महीने के बेटे को दूध पिला रही थीं.

वो कहती हैं, "अचानक से ज़ोर की आवाज़ आई और अँधेरा छा गया. मैंने अपने बच्चे को दोनों पैर के बीच में बचा कर रखा और ज़ोर से आवाज़ देने लगी. कई घंटे बाद किसी ने मेरी आवाज़ सुनी और हमें कई लोगों ने निकाला."

इत्तेफ़ाक़ की बात यह है कि ज़िंदा बच जाने वाले नौ लोगों में से आठ प्रमिला के ही परिवार के सदस्य हैं.

एक महिला कहती हैं, "सुबह का समय था कुछ लोग जाग गए थे. कुछ नाश्ता बनाने की तैयारी में लगे थे. बारिश तेज़ थी और अचानक पूरा गाँव मिटटी के अंदर आ गया."

मेरे वहां पहुँचने से पहले पुलिस ने गाँव के रास्ते की नाकाबंदी कर दी ताकि बचाव और राहत के काम में बाधा न आए.

'गाँव अब नज़र नहीं आता'

मैं एक स्थानीय नेता की गाडी में बैठकर डेढ़ घंटे का सफ़र तय करने के बाद मालिण गांव के क़रीब पहुंचा. वहां से दो किलोमीटर पैदल यात्रा के बाद गाँव तक पहुंचा.

चारों तरफ पहाड़, पहाड़ों के बीच खाई में एक बड़ी झील और पहाड़ों और झील के बीच बसे हैं कई गाँव. इन गांवों में रहने वाले हैं आदिवासी. क़ुदरत ने इस क्षेत्र में सुंदरता कूट-कूट कर भरी है. हवा भी साफ़, मौसम भी सुहाना और लगातार होती बारिश ने पहाड़ों में भी हरियाली भर दी है.

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मालिण गांव बुधवार तक नक़्शे पर था लेकिन आप इसे ढूंढने जाएंगे तो ये अब नज़र नहीं आएगा.

वैसे यह गांव अब मलबे का ढेर है. मानो यहां कभी कोई रहता ही नहीं था. आसपास में कुछ पक्की इमारतों को छोड़कर यहां कुछ नहीं बचा है.

यहाँ एक ऊंचे स्तंभ वाला मंदिर था जो अब मलबे के दब चुका है.

'ज़िंदा बचे होने की उम्मीद'

एक छोटे से गांव के लिए यह एक बड़ा हादसा था जिसका असर आसपास के गाँव के लोगों पर भी साफ़ दिखाई दे रहा था.

दो महिलाएं फूट-फूट कर रो रही थीं. उनकी बहन 48 घंटे बाद भी मलबे में दबी थी. उनके दो भाई और वो अलग-अलग गाँवों से आए थे.

एक तेज़ बहती पहाड़ी नदी के किनारे दूसरे गाँवों से आये लोग भी एक क़तार में इस उम्मीद के साथ बैठे थे कि उनके रिश्तेदार भी शायद मलबे से ज़िंदा निकल आएं.

लेकिन वहां केवल शव ही लाए जा रहे थे. शवों का वहीं अंतिम संस्कार किया जा रहा था.

'इतना भयानक मंजर कभी नहीं देखा'

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बचाव कार्य में लगे अधिकारी कहते हैं अब मलबे में से किसी का जीवित निकलना संभव नहीं है लेकिन उम्मीद के सहारे वे बचाव में जुटे हैं.

आसपास के गांवों से आए लोग भी उनकी मदद कर रहे हैं.

गोड़ेगांव से आए एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा इतना भयानक मंज़र उन्होंने पहले कभी नहीं देखा.

उन्होंने कहा, "हम इस गाँव को जानते थे लेकिन अब वहां मलबों का ढेर देख कर अजीब सा लगता है."

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