मालीण जैसे हादसे रोके जा सकते हैं?

  • 6 अगस्त 2014
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भूस्खलन का कारण क्या होता है? क्या इसे रोका जा सकता है? क्या इसमें इंसान का भी हाथ होता है?

इन्हीं सवालों का उत्तर जानने के लिए भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने देश भर में कमज़ोर, भूस्खलन वाले पहाड़ों का अध्ययन शुरू किया है जिसे पूरा होने में चार साल लग जाएंगे.

पुणे के निकट मालीण गांव में भूस्खलन से सौ से अधिक लोगों की मौत के बाद इस मुहिम का महत्त्व और भी बढ़ गया है.

देश में पहाड़ों की तीन बड़ी श्रृंखलाएं हैं- हिमालय, पश्चिमी घाट और नीलगिरि. इन तीनों श्रृंखलाओं में भूस्खलन के कारणों का अध्ययन शुरू हो गया है.

इस अध्ययन में विकास कार्यों और मौसम परिवर्तन के बीच संबंध का भी जायज़ा लिया जाएगा. इसकी रिपोर्ट भारत सरकार को पेश की जाएगी.

पढ़िए ज़ुबैर अहमद की पूरी रिपोर्ट

आज के दौर में भारत में तेज़ी से बढ़ती आबादी और तेज़ रफ़्तार से शहरों और क़स्बों के विकास के कारण जगह की कमी होने लगी है और अब बस्तियां, रिज़ॉर्ट पहाड़ों पर बनने लगे हैं.

पहाड़ों में खनन भी हो रहा है और कारखाने भी लग रहे हैं. कहीं लालच और मजबूरी दोनों इसका कारण हैं.

मुंबई और पुणे के बीच जो नया एक्सप्रेस वे बना है, उसके लिए कई जगह पहाड़ को काटा गया है या उसमें सुरंग बनाई गई है.

अगर आप एक्सप्रेस-वे के दोनों तरफ़ निगाह डालें तो पहाड़ों पर बने घर और बस्तियां भी दिख जाएंगी. जगह जगह पहाड़ों से खिसकते छोटे-बड़े पत्थर भी देखने को मिल जाएंगे.

'हमारी कोई नहीं सुनता'

लेकिन सवाल यह है कि क्या पहाड़ों पर यह निर्माण ज़रूरी है? क्या इससे भूस्खलन का ख़तरा बढ़ जाता है?

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के महाराष्ट्र के अध्यक्ष असीम साहा कहते हैं कि इस सवाल का जवाब आसान नहीं. लेकिन वह ये स्वीकार करते हैं कि पश्चिमी घाट अतिसंवेदनशील है और इन पर बस्तियां बसाने की सलाह वह नहीं देते.

उन्होंने स्वीकार किया कि उनकी सलाह 'स्थानीय प्रशासन में कोई नहीं सुनता'. विभाग के लोग कहते हैं कि कंस्ट्रक्शन लॉबी से लेकर तस्करी करने वाले सभी का प्रशासन पर दबाव होता है.

सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि पहाड़ों पर 'कब्ज़े' का मुख्य कारण भ्रष्टाचार है. मालीण के निकट घोड़ेगांव के धनंजय कोंकणी कहते हैं कि मालीण में आपदा आने का कारण भी भ्रष्टाचार है.

मालीण गांव के निकट एक और सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश तलेकर ने मालीण में कृषि विभाग के लोगों के खिलाफ पुलिस स्टेशन में एक रिपोर्ट दर्ज कराई है.

वह कहते हैं कि 'पड़कई योजना' आदिवासी किसानों के लिए शुरू की गई थी लेकिन पैसे खा रहे हैं कृषि विभाग के अधिकारी.

सुरेश तलेकर के मुताबिक, "मैं इनके पीछे आठ महीनों से पड़ा हूँ. आरटीआई का सहारा लेकर मैंने कई अहम दस्तावेज़ हासिल कर लिए हैं. मेरे पास कृषि विभाग में भ्रष्टाचार के सबूत हैं."

लैंड माफिया, बिल्डर्स, अधिकारी और नेताओं की मिलीभगत की चर्चा हर जगह सुनाई देती है. इसकी पुष्टि करना मुश्किल है. बस कभी-कभी आपदा के कारण इनकी भी पोल खुल जाती है.

एक उदाहरण है- मुंबई में साल 2005 के जुलाई में आई ज़बरदस्त बाढ़ का. लगातार बारिश के कारण साकी नाका इलाक़े में एक पहाड़ी पर भूस्खलन के कारण दर्जनों लोगों की मृत्यु हो गई थी.

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उस पहाड़ी पर कई अवैध, कच्चे घर बने थे. वे घर मिट्टी में बह गए थे लेकिन आज वहां वैसे ही घर फिर से बना दिए गए हैं और अधिकारियों को इस पर कोई आपत्ति भी नहीं हुई.

सहमति-असहमति

असीम साहा कहते हैं कि पश्चिमी घाट का 'ईको सिस्टम' नाज़ुक है, यहां बस्तियां बसाना और पहाड़ काटकर रास्ते बनाना अप्राकृतिक है.

प्रशासन के लोग कहते हैं कि पहाड़ियों पर निर्माण भी टाउन प्लानिंग का हिस्सा हो तो समस्या कम होगी.

एक अधिकारी ने कहा, "आबादी तेज़ी से बढ़ रही है. पुरानी बस्तियों का विस्तार हो रहा है और पहाड़ों के क़रीब बस्तियों के विकास की भी मांग होती है. प्रशासन को टाउन प्लानिंग के समय इन बातों का ख़्याल रखना पड़ता है."

पश्चिमी घाट की गोद में छह राज्यों यानी महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल हैं. यह पहाड़ श्रृंखला 'ईको सेंसिटिव ज़ोन' में आती है.

पिछले तीन सालों में इसकी सुरक्षा के सुझाव के लिए कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने माधव गाडगिल और कस्तूरीरंगन समितियों का चयन किया. दोनों की सिफारिशें सरकार के सामने हैं लेकिन अब तक इस पर कोई फैसला नहीं हुआ है.

गाडगिल समिति ने पूरे पश्चिमी घाट के आस-पास खनन, कारखानों और बस्तियों पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव दिया है. दोनों समितियों ने घाट के साथ छेड़छाड़ न करने की सलाह दी है.

लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात ये कि समिति ने कहा कि पश्चिमी घाट की पारिस्थितिकी या ईकोलॉजी सिस्टम की सुरक्षा के लिए जल्द कदम न उठाए गए तो उत्तराखंड जैसी प्रकृतिक आपदा आने का खतरा हो सकता है.

कस्तूरीरंगन समिति की एक सदस्य सुनीता नारायण कहती हैं कि दोनों समितियों में कई मामलों में आपसी असहमति है. लेकिन इससे किसी को इनकार नहीं कि पश्चिमी घाट को स्वस्थ रखने पर दोनों का ज़ोर है.

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