मालीण हादसा: वजहों पर माथापच्ची

  • 5 अगस्त 2014
चंद्रकांत झंजारे, मालीण इमेज कॉपीरइट AFP

महाराष्ट्र में पुणे ज़िले के मालीण गाँव में पिछले हफ्ते हुआ भूस्खलन प्राकृतिक आपदा था या फिर मानव निर्मित?

ये मुद्दा काफी विवादास्पद बनता जा रहा है. स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का दावा है कि ये मानव निर्मित है लेकिन भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अधिकारियों के प्रारंभिक आकलन के अनुसार ये कुदरत का खेल था. हालांकि इस बात से वो इनकार नहीं करते कि इस आपदा के लिए कहीं न कहीं इंसान भी ज़िम्मेदार है.

इस हादसे के कारणों का पता लगाने के लिए इस विभाग ने एक समिति बनाई है जो अपनी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को अगले महीने पेश करेगी.

वहीं महाराष्ट्र के कृषि विभाग ने बीबीसी को बताया कि वो इस बात की जांच करेगा कि इस आपदा के पीछे कहीं पहाड़ों के ढलानों में धान की खेती तो वजह नहीं.

पढ़िए ये विशेष रिपोर्ट

मालीण गाँव की एक महिला 30 जुलाई की सुबह सात बजे अपने घर से झील के किनारे अपने खेत में काम करने निकली थी. सब कुछ और दिनों की तरह था. बारिश भी पहले कुछ दिनों की तरह तेज़ हो रही थी लेकिन इतनी भारी बारिश भी नहीं थी कि वो खेत में काम करने का फैसला स्थगित कर दे.

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वो खेत में काम करके जब लौटी तो उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक चुकी थी.

उन्होंने बताया, "जब मैं खेत में जाने के लिए निकली थी तो सब मौजूद था लेकिन वापस लौटने पर कुछ भी नहीं था". वो इसलिए कि लगभग पूरा गाँव पहाड़ की चोटी से ज़ोर से गिरी मिट्टी के तले दब गया था

इंसान, मवेशी, सामान, पेड़ और पौधे सब मिटटी में मिल चुके थे.

मर चुका है मालीण

वो कहती हैं, "अगर मैं खेत में न जाती तो मुझे भी बचाव दल के लोग मिटटी के अंदर से निकालने की कोशिश कर रहे होते और शायद केवल शव निकाल पाते."

मालीण गाँव का देहांत हो गया है. अब वो केवल नक़्शे पर है. हकीकत में इसका वजूद अब नहीं है. मिट्टी के करीब 70 घरों में से एक भी नहीं बचा. कुछ पक्के घरों की दीवारें अब भी वहां मौजद हैं लेकिन टूटे-फूटे हाल में.

अगर आसपास के गांवों पर निगाह डालें तो अंदाज़ा होगा कि आदिवासियों का ये गाँव कितना सुंदर रहा होगा. चारों तरफ हरियाली, चारों तरफ ऊंचे पहाड़ और बीच में टेढ़ी मेढ़ी रेंगती झील और इन दोनों के बीच ढलानों पर आदिवासियों के गाँव. ये किसी फ़िल्म के सेट से कम नहीं लगता

लेकिन जितने सुंदर गाँव और आदिवासियों की प्रकृति से जितनी नज़दीकी उतनी ही ज़्यादा ग़रीबी. इन गाँवों में जाना आसान नहीं. तंग रास्ते और वो भी ऊंचाई पर. इसीलिए यहाँ के लोगों में बेरोज़गारी है, शिक्षा की कमी है और यहां अनाज की किल्लत है

इसी कारण इन आदिवासियों के लिए महाराष्ट्र सरकार ने साल 2010-11 में एक योजना शुरू की थी जिसका नाम पड़कई योजना है.

'ग़लत जगह चुनी गई'

इस योजना के तहत आदिवासियों को पहाड़ों के ढलानों पर धान की खेती की इजाज़त दी गई थी. कृषि विभाग की यह योजना सफल हुई. मालीण गाँव में भी पहाड़ और झील के बीच ढलान पर खेती शुरू हुई. तीन या चार फुटबॉल के मैदान के बराबर ज़मीन पर खेती की जा रही थी

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मालीण में हुए भूस्खलन के बाद अब ये सवाल उठ रहे हैं कि कहीं ये योजना इसकी ज़िम्मेदार तो नहीं?

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश तलेकर आरोप लगाते हैं कि इस योजना के तहत कृषि विभाग के कर्मचारियों ने आदिवासियों के नाम पर ग़लत जगह पर अधिक ज़मीनों को लेकर उन पर खेती कराई जिसके कारण पहाड़ की चट्टान ढलानों से अलग की गई और पेड़ काटे गए. मिट्टी खिसकी और बारिश ने बाक़ी काम कर दिखाया.

सुरेश तलेकर कहते हैं, "योजना बहुत अच्छी है लेकिन कृषि विभाग ने खेती के लिए जो जगह चुनी वो सही नहीं थी. जो जगह उन्होंने चुनी उसका ढलान 60 डिग्री था. इसके अलावा ढलान को समतल करने के लिए चट्टानों और पेड़ों को मशीनों से हटाया गया जिसके कारण मिट्टी ढीली पड़ गई और बारिश के कारण मिट्टी नीचे बस्ती में आ गिरी."

पास के गाँव के कुछ लोग भी उनसे सहमत दिखे. इनमें से एक ने देसी अंदाज़ में मुझे इस तरह से समझाया, "अगर आपको एक अमरूद खाने को दिया जाए और आप एक साथ दस खा लें तो पेट ख़राब होगा या नहीं?"

'भ्रष्टाचार की जांच होगी'

महाराष्ट्र के कृषि आयुक्त उमाकांत दंगत कहते हैं कि इस आपदा में इस योजना का कितना हाथ है इसकी जानकारी हासिल करना ज़रूरी है.

उन्होंने कहा, "हम अब इस योजना की समीक्षा करेंगे और योजना में भ्रष्टाचार की भी जांच करेंगे."

लेकिन भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के महानिदेशक हरबंस सिंह ने मालीण से लौटने पर कहा, "ये है तो प्राकृतिक आपदा लेकिन इंसान का हाथ कितना है ये जांच ख़त्म होने के बाद ही पता चलेगा."

फिर वो तुरंत अपने बयान को वज़न देते हुए कहते हैं, "इंसान भी इसका ज़िम्मेदार हो सकता है."

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