प्राण गए, पर यादें रहेंगी

कार्टूनिस्ट प्राण अपने अंतिम दिनों तक कार्टून बना रहे थे. बीते एक साल से कैंसर से पीड़ित प्राण को 17 जुलाई, 2014 को अस्पताल में भर्ती कराया गया. वे तब तक अपने पाठकों के लिए कार्टून बना रहे थे.

उनकी पुत्रवधू ज्योति प्राण ने बीबीसी हिंदी को बताया, "अस्पताल जाने के दिन तक वे कार्टून बना रहे थे. अपने पाठकों तक अपने कैरेक्टर को पहुंचाने में उन्हें सबसे ज़्यादा ख़ुशी मिलती थी."

प्राण ने इस बात का भी ख़याल रखा कि जब वे नहीं होंगे तब उनके पाठकों को उनकी कोई कमी न खले. चाचा चौधरी, साबू जैसे अपने तमाम किरदारों के कई सीरीज़ उन्होंने पहले ही बना दिए थे.

(प्राण का बीबीसी हिंदी के साथ आख़िरी इंटरव्यू)

ज्योति प्राण ने बताया, "अंतिम समय तक वे काम कर रहे थे. उन्होंने पाठकों के लिए आगे तक का काफी कॉमिक्स पहले से ही बना दिया था."

ख़ास पहचान

वहीं मशहूर कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग ने प्राण के योगदान को बेहद ख़ास बताया.

(जब साबू मंगल ग्रह पर पहुंचा...)

उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, "प्राण अकेले ऐसे कार्टूनिस्ट थे, जिन्होंने कार्टून की दुनिया के पश्चिमी आधिपत्य को तोड़ा था."

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तैलंग के मुताबिक प्राण ने कॉमिक कार्टूनिंग की दुनिया में अपने हिंदुस्तानी कैरेक्टरों के साथ अलग पहचान कायम की थी.

उन्होंने बताया, "भारत में बेहतरीन राजनीतिक कार्टूनिस्ट तो कई हुए हैं, लेकिन कॉमिक की दुनिया में प्राण जितनी कामयाबी और शोहरत किसी को नहीं मिली."

प्राण की कामयाबी और शोहरत की चर्चा करते हुए तैलंग कहते हैं, "प्राण की सबसे बड़ी ख़ासियत यह रही कि उन्होंने अपने चरित्रों को बाज़ार की दुनिया में भी कामयाब बनाया. इस लिहाज से वे वर्सेटाइल साबित हुए."

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