कौन डरता है सांप्रदायिक हिंसा बिल से?

सहारनपुर दंगा

देश में बढ़ते सांप्रदायिक दंगों पर बहस से इनकार किए जाने के बाद बुधवार को राहुल गांधी लोकसभा अध्यक्ष के आसन तक पहुंच गए थे.

संसद में राहुल गांधी की इस आक्रामकता की तरह तरह से व्याख्या की गई. लेकिन यूपीए सरकार के दौरान तैयार किए गए सांप्रदायिक हिंसा विरोधी बिल को लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं हुई.

प्रिवेंशन ऑफ़ कम्यूनल वायलेंस (एक्सेस टु जस्टिस एंड रेपेरेशंस) बिल, 2013 फिलहाल राज्यसभा में है. संसद में बहस के दौरान भाजपा ने इसका जमकर विरोध किया जबकि तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता पहले ही इस पर विरोध जता चुकी हैं. समाजवादी पार्टी ने इसका समर्थन किया था.

पिछली यूपीए सरकार इसे संसद में लाने वाली थी, पर विरोध के कारण इसे पारित नहीं कराया जा सका. क्या यह केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी का नतीजा भर है?

विधेयक की तैयारी से जुड़ी रहीं वकील वृंदा ग्रोवर का कहना है कि ज़्यादातर राजनीतिक दल यह विधेयक पारित नहीं होने देना चाहते, क्योंकि इससे उन्हें फ़ायदा पहुंचता है.

विधेयक के विवाद वाले प्रावधान क्या हैं और इसके पारित होने में कौन रोड़े अटका रहा है?

पढ़ें सांप्रदायिक हिंसा बिल पर पूरा विश्लेषण

संसद में आमतौर से खामोश रहने वाले कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी बुधवार को लोकसभा में क्यों भड़के? उत्तर प्रदेश में बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं पर बहस कराने से सरकार के इनकार के कारण.

वह पहली बार लोकसभा में अध्यक्ष के आसन तक पहुंच गए. मीडिया में इसकी खूब चर्चा हुई और टिप्पणियां लिखी गईं.

  • यूपीए ने 2004 आम चुनाव में सांप्रदायिक हिंसा विरोधी क़ानून बनाने का वादा किया था.
  • 2005 में लाए गए बिल की काफ़ी आलोचना हुई और फेरबदल के बाद 2011 में इसे फिर लाया गया.
  • बिल पर फ़रवरी 2014 में संसद में बहस हुई, पर भाजपा के विरोध के बाद इसे वापस ले लिया गया.
  • भाजपा और हिंदुत्व समर्थक पार्टियों ने इसे हिंदू विरोधी बताया क्योंकि उनके अनुसार, इसका इस्तेमाल तभी हो सकता है जब अल्पसंख्यकों पर हमले हों.

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने भी इस पर आपत्ति जताई थी. बिल वापस लेने पर सपा नेता मुलायम सिंह ने कहा था कि कांग्रेस सांप्रदायिक ताक़तों के आगे झुक गई.

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लेकिन उनसे यह सवाल किया जा सकता है कि उनकी पार्टी सांप्रदायिक हिंसा की रोकथाम के लिए तैयार किए गए बिल को संसद में पारित कराने में नाकाम क्यों रही और उस समय वह नाराज़ क्यों नहीं हुए?

इस हंगामे के बीच विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ताओं की वो आवाज़ें दब गईं, जो चाहते हैं कि सांप्रदायिक हिंसा विरोधी बिल संसद से पारित हो, ताकि दंगों पर क़ाबू पाया जा सके.

विधेयक का मसौदा बनाने में शामिल रहीं प्रसिद्ध वकील वृंदा ग्रोवर कहती हैं, ''बिल पारित कराने के बाद सांप्रदायिक हिंसा में कमी आएगी.''

वह कहती हैं, "जब आप सज़ा देना शुरू करेंगे और जब प्रशासक जेल जाने से डरेंगे तो उन्हें अपने आप काम करने का तरीक़ा आ जाएगा."

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इसी साल फ़रवरी में संसद में विवाद के बाद यूपीए सरकार ने बिल वापस ले लिया था.

वृंदा ग्रोवर के अनुसार, ''कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं चाहती कि बिल पास हो और नया क़ानून बने.'' उनके अनुसार, ''राजनीतिक इक्छाशक्ति की सख़्त कमी है.''

मोदी ने किया था विरोध

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लेकिन क्यों? वो कहती हैं, "फ़ायदा है राजनीतिक पार्टियों को, फ़ायदा है उनके नेताओं को. अफ़सोस की बात है कि लोकतंत्र में आप दंगे करते हैं और आपको वोट मिलता है."

बिल में इसका प्रावधान है कि सरकारी अफ़सर और स्थानीय सांसद अगर दंगे रोकने में नाकाम रहे, तो उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाया जाएगा.

शायद इसीलिए इस बिल को पारित कराने में किसी की दिलचस्पी नहीं है. बिल के संसद में पेश होने के बाद मौजूदा प्रधानमंत्री और उस समय के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि ये भारत के संघीय ढांचे के ख़िलाफ़ है.

उन्होंने उस समय ट्वीट किया था, "सांप्रदायिक हिंसा विरोधी बिल भारत के संघीय ढांचे का उल्लंघन करता है. केंद्र ऐसे मामले में क़ानून बनाने की कोशिश कर रहा है जो स्टेट लिस्ट में आता है."

उस समय हिंदुत्व समर्थक पार्टियों ने इसे 'हिंदू विरोधी बिल' भी कहा था. इसके अलावा यह भी कहा गया था कि बिल समाज में सांप्रदायिक सोच को बढ़ावा देगा.

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