नाबालिग अपराधियों पर क़ानून

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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में बदलाव को मंजूरी दे दी है.

मौजूदा क़ानून के तहत 18 साल से कम उम्र के अभियुक्त का मुक़दमा सामान्य अदालत की जगह जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में चलता है और दोषी पाए जाने पर उसे अधिकतम तीन साल की अवधि के लिए किशोर सुधार घर भेजा जाता है.

अब संगीन जुर्म के मामले में सरकार इस क़ानून में संशोधन का प्रस्ताव संसद में लाने वाली है.

साथ ही प्रस्ताव में ये भी प्रावधान डाला गया है कि अगर 16 साल से ऊपर का नाबालिग कोई संगीन अपराध करता है, तो जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ये तय करेगा कि नाबालिग अभियुक्तों के ख़िलाफ़ नियमित अदालत में मुक़दमा चले या नहीं.

तो सवाल ये है कि संगीन जुर्म के मामले में जुवेनाइल क़ानून में संशोधन की कोशिश कितनी जायज़ है?

क्या नाबालिग अपराधियों को बेहतर इंसान बनने का मौका दोबारा नहीं मिलना चाहिए.

साथ ही सवाल ये भी है कि किशोरों को अपराधी बनाने के पीछे समाज कितना ज़िम्मेदार है.

इस शनिवार यानी नौ अगस्त को बीबीसी इंडिया बोल में बहस इसी मुद्दे पर

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