जिनके दिल में आज भी बसता है लीबिया

  • 10 अगस्त 2014
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Image caption लीबिया का शहर बेनग़ाज़ी अपने खूबसूरत समुद्र तटों के लिए मशहूर है

एक बार फिर से लीबिया चर्चा में है. विद्रोह की लपटों के बीच केरल की पचास नर्सें अपने मुल्‍क लौट आई हैं और एक भारतीय मजदूर को वहां अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.

ऐसा ही कुछ वर्ष 2011 में भी लीबिया में देखने को मिला था. पूरा मुल्‍क एक बार फिर अराजकता की भेंट चढ़ गया है.

इसी अराजकता के बीच अपने दो बच्‍चों के साथ भारत लौटीं भोपाल की डॉक्टर अंजना तिवारी बता रही हैं इस मुल्‍क की एक ऐसी तस्‍वीर जो लीबिया को अन्‍य मुल्‍कों से अलग करता है.

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मुझे आज भी फरवरी, 2011 की वो सुबह याद है, जब मिस्र में फैली बदलाव की लपटों ने उस लीबिया को भी अपनी चपेट में ले लिया था, जहां मैं रहती थी.

शुरुआत में मैंने ऐसी ख़बरों पर ध्‍यान नहीं दिया क्‍योंकि तीन बरसों से रहते हुए कभी भी मुझे इस बात का थोड़ा भी अंदाजा नहीं था.

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मैंने अशांति की बातें सुनी तो इन्हें कोरी अफ़वाह ही समझा. इस विद्रोह से पहले तक लीबिया मेरे लिए एक ऐसा मुल्‍क था जहां लोग बेहद सुकून से रहते थे.

भारत की तरह वहां के बाज़ार भी शाम होते गुलजार हो उठते. पड़ोसियों ने कभी भी यह अहसास नहीं होने दिया कि मैं किसी बेगाने देश में हूं.

लेकिन फरवरी 2011 को सब कुछ बदल चुका था. बेनग़ाज़ी की सड़कों पर हज़ारों लोग हाथों में अत्‍याधुनिक हथियार लिए विरोध के नारे बुलंद कर रहे थे.

यह मुझे डराने के लिए काफ़ी था. भारत की सड़कों पर मैं कई आंदोलन देख चुकी थी लेकिन हथियारों की ऐसी नुमाइश पहली बार देख रही थी.

हालात बदले

अब ख़ुद को यह यकीन दिलाना पड़ा कि अब हालात पहले जैसे नहीं रहे. मार्च की शुरुआत तक तो भूमध्य सागर के किनारे बसा यह ख़ूबसूरत देश पूरी तरह सुलग उठा था.

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कर्नल गद्दाफ़ी के प्रयासों ने बदलाव की इस आग को और ज़्यादा भड़का दिया था. अब इस देश में हमारे जैसे लोगों का रहना सुरक्षित नहीं था. हमें जल्‍दी से जल्‍दी वहां से निकलना था. आख़िरकार मैं भारत लौटने में सफल रही.

लेकिन भारत लौटने के कई महीनों बाद तक लीबिया मेरे जेहन में बसा रहा. मैं बार-बार यही सोचती रही कि इस बेहद ख़ूबसूरत देश में ऐसा कहर क्यों बरपा है. उस देश में जहां न खाने की दिक़्क़त है न रहने की कोई समस्या.

जहां के लोग शायद दुनिया के सबसे भोले लोगों में से हैं, जहां आप रात में भी हज़ारों दीनार लेकर अकेले घर आ सकते हैं. जहां के लोग अपने मेहमान को बड़ा ऊंचा दर्जा देते हैं, आख़िर उस देश में ऐसा क्यों हो रहा है?

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बेनग़ाज़ी के जिस पॉश इलाक़े में पांचवीं मंजिल पर मैं और मेरे दोनों बच्चों रहते थे, वहां की बालकनी से हमने बेनग़ाज़ी की सड़कों पर गुज़रते गद्दाफ़ी की सेनाओं के टैंकों को देखा. हम पूरे दिन विरोध प्रदर्शन देखते रहे.

हमने देखा कि गद्दाफ़ी के सैनिक विद्रोहियों को प्यार से मनाने का प्रयास कर रहे थे. शुरू में उन्होंने समझाने की कोशिशें की लेकिन बाद में वो हिंसक हो गए.

अपनापन

हमने गोलियों की आवाज़ सुनीं, फिर धमाकों की गूंज सुनी, लेकिन कभी डर नहीं लगा क्योंकि मेरी मकान मालकिन हमेशा यह विश्वास दिलाती थीं कि वो अपनी जान की बाज़ी लगाकर भी हमें कुछ नहीं होने देंगी.

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संघर्ष के दिनों में स्थानीय लोग हमेशा मदद को तैयार थे. जब हवाई हमले हो रहे थे तब मुझसे बार-बार कहा जा रहा था कि मैं बच्चों के साथ नीचे वाले फ्लैट में शिफ्ट हो जाऊं.

लेकिन फिर हालात इतने बिगड़े कि हमें लीबिया छोड़ने के बारे में तय करना पड़ा. फ़रवरी के अंतिम सप्ताह में हमने लीबिया छोड़ने की तैयारी शुरू की.

स्थानीय परिचित लोगों ने हमें रोकने का हरसंभव प्रयास किया. वो बार-बार यही कहते रहे कि आप लोगों को कोई ख़तरा नहीं होगा.

खूबसूरत यादें

हम अपने भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन अपनी जान पर खेलकर भी आपकी हिफ़ाजत करेंगे.

28 फ़रवरी की शाम को जब हम लीबिया छोड़ रहे थे तो वहां के लोगों की आंखें नम थी.

मेरे साथी स्थानीय प्रोफ़ेसरों और शिक्षकों ने लीबिया में जो हुआ उसके लिए माफ़ी मांगी और यह विश्वास जताया कि जल्द ही सब कुछ सामान्य हो जाएगा.

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लीबिया को छोड़ते हुए कुछ अजीब सा लग रहा था. इन तीन सालों में लीबिया ने मुझे बहुत कुछ दिया. इस देश की ख़ूबसूरत यादों को लेकर मैं भारत रवाना हो रही थी.

बेमन से दोनों बच्चों के साथ उसी शाम मैं जितना हो सकता था सामान लेकर जहाज़ पर चढ़ी.

जहाज़ पर हम सभी के पास अपनी कमाई थी, क़ीमती चीज़ें थीं लेकिन लूटमार तो दूर, किसी ने पूछा भी नहीं कि आप क्या ले जा रहे हैं. सहमे चेहरे क्षत-विक्षत होते देश का आईना बन गए थे.

कसक

भारत सरकार ने वापसी के लिए अच्छा इंतज़ाम किया था. हम एक मार्च की सुबह बेनग़ाज़ी से मिस्र के एलेक्जेंड्रिया के लिए चले.

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ढाई दिन बाद एलेक्जेंड्रिया पहुंचे. चार मार्च को एयर इंडिया की फ़्लाइट हमें दिल्ली ले आई.

मैं उस ख़ूबसूरत देश को जलता छोड़ आई थी जहां मेरे ढेर सारे छात्र भविष्य में चमकने की तैयारी कर रहे थे.

लौटते वक़्त मुझे उनकी चिंता थी. वहां के भोले-भाले लोगों की चिंता थी. जो शायद दुनियादारी के लिए ज़रूरी उतना कपट नहीं जानते थे.

आज जब हिंदुस्तान में मैं लीबिया पर पश्चिमी सेनाओं के हमले के बारे में पढ़ती हूं तो बस यही ख्याल आता है कि वहां के लोग मानवाधिकारों के नाम पर किए जा रहे इन हमलों की अंतर्कथा को उसी शिद्दत से समझ पा रहे होंगे.

बस यही दुआ है कि यह ख़ूबसूरत देश बर्बाद न हो. लोगों में वही ज़िंदादिली बरकरार रहे. यदि जिंदगी में मौका मिला तो एक बार फिर से इस ख़ूबसूरत देश की सड़कों पर अपने बच्‍चों के लिए घूमना चाहूंगी.

(डॉ. अंजना तिवारी भोपाल स्‍थित NITTTER में सॉफ़्ट स्किल्स डिपार्टमेंट में सहायक प्रोफ़ेसर हैं.)

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