क्या कोई है, जिसकी जासूसी नहीं हो रही?

  • 12 अगस्त 2014
नरेंद्र मोदी, सुषमा स्वराज, जॉन केरी, पेनी इमेज कॉपीरइट AP

अमरीकी विदेश मंत्री की भारत यात्रा के दौरान भारतीय विदेश मंत्री ने अमरीकी गुप्तचर एजेंसियों द्वारा भारत की जासूसी का मुद्दा काफ़ी सख़्ती से उठाया था.

केरी इसका ठीक से जवाब भी नहीं दे पाए. लेकिन सुषमा स्वराज ने जो सख्ती दिखाई, संभवतः वह पर्याप्त नहीं.

ब्राज़ील और जर्मनी जासूसी के मामले पर अमरीका को और सख़्त संदेश दे चुके हैं.

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के घर से जासूसी उपकरण की ख़बर की सरकार ने विस्तृत जांच क्यों नहीं करवाई?

भारत के आम नागरिकों की निजता आज सबसे ज़्यादा ख़तरे में है, क्योंकि इस पर सरकारों, गुप्तचर एजेंसियों और सोशल मीडिया कंपनियों सहित कइयों की नज़रें हैं.

और आम आदमी के पास निजता का अधिकार नहीं है.

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अमरीकी विदेश मंत्री जॉन केरी की भारत यात्रा दोनों देशों के संबंधों में एक निर्णायक मोड़ हो सकती थी लेकिन यह जो भी रही हो, इसने नई राह तो नहीं ही बनाई.

अमरीकी विदेश मंत्री कुछ दिन पहले भारत इसलिए आए थे कि देवयानी खोबरागड़े और व्यापार मतभेद जैसे कई मुद्दों की वजह से तनावपूर्ण हो गए संबंधों की ज़मीन 'फिर तैयार' की जा सके.

यह यात्रा भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सितंबर में बहुप्रतीक्षित अमरीका यात्रा का कार्यक्रम तय करने में सफल हुई या नहीं यह अलग बात है. भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अमरीकी सुरक्षा संस्था (एनएसए) द्वारा भारत की जासूसी करवाने के मुद्दे पर जबरदस्त डांट लगाई, ख़ासतौर पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की जासूसी के मामले पर, जब वह सत्ता में नहीं थी.

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एक आधिकारिक मुलाकात में सुषमा ने केरी को कहा, "दोस्त एक-दूसरे की जासूसी नहीं करते."

केरी इसके अलावा कुछ और नहीं कह पाए कि अमरीका 'गुप्तचरी के मामले पर कोई टिप्पणी नहीं करता'.

सिर्फ़ बीजेपी की चिंता

तो यह यात्रा जिसे कई अन्य सकारात्मक वजहों से चर्चा में रहना चाहिए था, एनएसए की ओर से हुई जासूसी के मुद्दे पर नई सरकार के 'सख़्त रुख़' की वजह से ख़बरों में आई.

हालांकि सुषमा स्वराज ने अमरीकी जासूसी की कड़ी आलोचना की लेकिन इसमें दो बातें उल्लेखनीय थीं.

पहली तो यह कि वह बीजेपी नेताओं की जासूसी को लेकर ज़्यादा चिंतित थीं बनिस्बत पहले की रिपोर्ट्स के, जिनमें बताया गया था कि अमरीका भारतीय नेताओं, अफ़सरों और देश के अंतरिक्ष और परमाणु कार्यक्रम की जासूसी कर रहा है. (इसी पत्रकार द्वारा सितंबर, 2013 में हिंदू अख़बार के लिए ख़बर की गई थी.)

दूसरी बात यह कि सुषमा स्वराज ने यह भी जता दिया कि पिछली यूपीए सरकार के मुकाबले नई सरकार से बात करना ज़्यादा आसान है क्योंकि उन्होंने अमरीका के साथ मित्र देशों के बीच जासूसी को लेकर कोई लक्ष्मण रेखा नहीं खींची.

यह ब्राज़ील और जर्मनी जैसे देशों द्वारा अपनाए गए रुख़ से काफ़ी अलग है.

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ब्राज़ीलियाई राष्ट्रपति डिल्मा रूसेफ़ ने सख़्त इंटरनेट कानून बनाने के साथ ही अमरीका की अपनी आधिकारिक यात्रा भी रद्द कर दी तो जर्मनी ने हाल ही में अपनी सरकार की जासूसी के आरोप में एक सीआईए एजेंट को गिरफ़्तार किया है.

कोई सुरक्षित नहीं

हालांकि नई सरकार से अमरीका से सीधे भिड़ जाने की उम्मीद करना थोड़ा ज़्यादा अपेक्षा करना हो सकता है, लेकिन इसी दौरान की एक घटना की अनदेखी करना आसान नहीं.

जब सुषमा स्वराज एनएसए की जासूसी को लेकर शोर मचा रही थीं तभी ख़बर आई कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के घर में किसी संस्था ने जासूसी उपकरण लगाए हुए हैं.

हालांकि सरकार ने इस घटना को ज़्यादा तूल नहीं दिया लेकिन इससे कुछ साल पहले तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी (अब राष्ट्रपति) के ऑफ़िस में जासूसी उपकरण लगाने जाने की घटना की याद आ गई.

तब की यूपीए सरकार भी उम्मीद के विपरीत उस मामले को गंभीरता से लेने या जांच करवाने में नाकाम रही थी.

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चूंकि इन दोनों मामलों की जांच मौजूदा सरकारों ने नहीं करवाई इसलिए यह कहना मुश्किल है कि कौन सा व्यक्ति या संस्था, जासूसी उपकरण लगाने के लिए ज़िम्मेदार था और उसका उद्देश्य क्या था?

लेकिन यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि ऐसी जासूसी सरकार और पार्टियों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और सत्ता संघर्ष के चलते होती है.

जासूसी वाले मामले पर एनएसए के दस्तावेज़ों से एक बेहद डरावनी बात पता चली थी, वह यह कि सरकार से लेकर राजनीतिक दल और व्यक्तियों तक, भारत में कोई भी- शक्तिशाली गुप्तचर संस्थाओं से सुरक्षित नहीं है.

भारतीयों की मुश्किल

भारतीय नागरिकों के लिए ये ज़्यादा डरावना क्यों है, इसकी वजह दो तथ्य हैं- पहला तो यह कि एक आम नागरिक के पास निजता की कोई वैधानिक गारंटी नहीं है. और दूसरा यह कि गुप्तचर एजेंसियां सरकार के अलावा किसी और के प्रति जवाबदेह नहीं हैं, जो कभी भी इनका दुरुपयोग कर सकती हैं.

भारत में यह कोई गुप्त बात नहीं है कि एक के बाद एक सरकारें कैसे हर चुनाव के पहले 'सर्वेक्षण' करवाने के लिए गुप्तचर ब्यूरो (आईबी) का इस्तेमाल करती हैं.

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यह भी कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है कि ज़िला या कस्बे स्तर पर पुलिस अधिकारी या स्थानीय गुप्तचर संस्थाएं आम लोगों के फ़ोन टैप करवा सकती हैं या चिट्ठियों को रोक सकती हैं.

क्योंकि आम आदमी के पास सरकारी तंत्र को चुनौती देने के लिए कानूनी या आपराधिक संसाधन कम हैं.

सूचना के इस नए युग में कहा जाता है कि आंकड़े ही नया तेल हैं. जिसके पास सबसे ज़्यादा आंकड़े होंगे वह सबसे ज़्यादा शक्तिशाली होगा. और इसीलिए एनएसए से लेकर सोशल मीडिया कंपनियां और सरकारें देशों, कंपनियों, पार्टियों और व्यक्तियों के बारे में जानकारियां जुटा रही हैं.

अगर सुषमा स्वराज ने केरी के सामने जासूसी का मुद्दा ज़्यादा मजबूती और साफ़ तरीके से उठाया होता तो इससे लगता कि भारत की नई सरकार भारतीय नागरिकों की निजता को लेकर प्रतिबद्ध है.

मोदी के पास मौका है कि सितंबर में अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के पास मुलाकात में इन कमियों को दूर कर लें. अभी तो बस अटकलें ही लगाई जा सकती हैं कि मोदी इस मामले पर हंगामा खड़ा करेंगे या नहीं.

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