आज़ाद ने कानपुर में उतारी थी खादी टोपी

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भारत की आज़ादी की लड़ाई में शामिल चंद्रशेखर आज़ाद की एक ही तस्वीर मिलती है- मूछों को ताव देते हुए. ऐसे में यह कल्पना करना कठिन है कि वह खादी की टोपी भी पहनते थे.

कहा जाता है कि कानपुर में आज़ाद ने अपनी टोपी उतार दी थी. आज इसे आप मेस्टन रोड स्थित अशोक पुस्तकालय में देख सकते हैं.

चंद्रशेखर आज़ाद के साथी दादा नारायण प्रसाद अरोड़ा के पोते अरविंद अरोड़ा ने बीबीसी को बताया, "1925 में काकोरी लूट कांड के बाद चंद्रशेखर आज़ाद लखनऊ से कानपुर आने के लिए ट्रेन पर चढ़े. रास्ते में उन्हें लगा कि कानपुर स्टेशन पर उन्हें पकड़ने के लिए पुलिस होगी. तो वे रास्ते में उन्नाव ज़िले के गंगा घाट स्टेशन पर उतर गए."

अरविंद अरोड़ा कहते हैं, "गंगा घाट स्टेशन से वे पैदल कानपुर आए. मेरे दादा नारायण प्रसाद का घर कानपुर के पटकापुर इलाक़े में था और बाक़ी साथियों की तुलना में मेरे दादा का घर सबसे क़रीब था. तो चंद्रशेखर आज़ाद मेरे दादा के घर आकर रुक गए."

उन्होंने बताया, "अगले दिन सुबह चंद्रशेखर आज़ाद को निकलना था, पर कई जगह पुलिस वाले तैनात थे. चंद्रशेखर आज़ाद ने हुलिया बदलने के लिए अपनी खादी टोपी मेरे पिताजी को दे दी और मेरे पिताजी की हैट पहन ली. हैट पहनकर वे पुलिस वालों के सामने से निकल गए. पुलिस वाले उन्हें पहचान नहीं सके."

टोपी के क़िस्से

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अरविंद अरोड़ा के मुताबिक़ उनके पिता द्रोण अरोड़ा चंद्रशेखर आज़ाद से दो साल छोटे थे.

अरविंद बताते हैं कि 1925 से ही चंद्रशेखर आज़ाद की टोपी उनके परिवार के पास है और इस टोपी और उससे जुड़े क़िस्से सुनकर बड़े हुए हैं.

2012 में अरविंद अरोड़ा ने यह टोपी अशोक लाइब्रेरी को भेंट कर दी जहां वह एक कांच के बक्से में रखी गई है.

लाइब्रेरी चलाने वाले ट्रस्ट तिलक मेमोरियल सोसाइटी के सचिव केके द्विवेदी ने कहा, "कई लोग और स्कूली बच्चे टोपी देखने आते हैं. कई लोग टोपी देखकर भावविभोर हो जाते हैं और उसे नमन करते हैं."

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