कांग्रेस क्यों चाहती है नेता प्रतिपक्ष का पद?

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लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने कहा है कि नेता प्रतिपक्ष पद के मामले में उन्हें कोई विशेषाधिकार नहीं है कि वो नियम और परंपरा से बाहर जाकर कोई फ़ैसला कर सकें.

उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि अगर सदन को ये नियम ठीक नहीं लगता है, तो उसमें बदलाव किया जा सकता है.

कांग्रेस के पास प्रतिपक्ष नेता के लिए जरूरी संख्या - 55 सांसद नहीं हैं. उसके पास 44 सदस्य हैं. फिर भी कांग्रेस मल्लिकाअर्जुन खड़गे को नेता प्रतिपक्ष का पद मिले.

कांग्रेस के पास, जो सबसे लंबे समय तक सत्ता में रही है नए नियम बनाने और नई परंपरा शुरू करने का अवसर रहा लेकिन उसने ऐसा नहीं किया.

कांग्रेस का कहना है कि संविधान में संशोधनों के चलते संवैधानिक पदों पर होने वाली कई नियुक्तियों में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका होती है. इसमें केंद्रीय सूचना आयोग, सर्तकता आयोग और लोकपाल की नियुक्ति शामिल है.

एनडीए सरकार चाहती तो वो नियम बदल सकती थी और कांग्रेस को नेता प्रतिपक्ष का पद कंग्रेस को मिल सकता था.

सरकार की मंशा नहीं

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हाल ही में, हमने देखा कि सरकार ने उपाध्यक्ष का पद अन्नाद्रमुक को दे दिया. इससे साफ है कि बीजेपी और एनडीए की नजर सदन के अंदर समर्थन के लिए कांग्रेस से इतर राजनीतिक दलों पर है.

दरअसल, कांग्रेस संवैधानिक पदों की नियुक्तियों में अपनी भूमिका को लेकर चिंतित है. इसलिए वो नेता प्रतिपक्ष के पद पर लगातार दावा कर रही थी. नेता प्रतिपक्ष का दर्जा मिलने पर संवैधानिक रूतबा मिलता है, दूसरे विपक्षी दलों को साथ लेने में आसानी होती है.

हालांकि सदन में नेता प्रतिपक्ष के नहीं होने पर संसद की कार्यावाही पर कोई असर नहीं पड़ता है. बिना पद के कांग्रेस सदन के अंदर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी तो है ही. अब यह देखना है कि उनके नेता दूसरे विपक्षी नेताओं को कैसे साथ लेकर चलते हैं.

वैसे सोलहवीं संसद के अंदर मौजूदा स्थिति तो यह है कि अन्नाद्रमुक, बीजू जनता दल और तृणमूल कांग्रेस जिनको मिलाकर सौ करीब सांसद होंगे, वो सदन के अंदर कांग्रेस के साथ बैठे हुए दिखना भी नहीं चाहते हैं.

(बीबीसी संवाददाता समीरात्मज मिश्र से बातचीत पर आधारित)

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