ईरान और सऊदी अरब में वर्चस्व का संघर्ष

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अरब देशों में अमरीका की गिरती साख सऊदी अरब के कम होते असर से जुड़ी है और यह ठीक ऐसे समय हो रहा है जब ईरान का असर इस क्षेत्र में बढ़ रहा है.

ईरान के 1979 के इस्लामी क्रांति के नेता अयातुल्लाह ख़मेनेई ने कहा था इस क्रांति को 'हम ईरान की सरहदों से बाहर भेजेंगे'.

उनकी तमन्ना अब पूरी हो रही है. ईरान का असर अब इराक़ में हाल में प्रधानमंत्री पद छोड़ने वाले नूरी अल मलिकी, सीरिया में बशर अल असद और लेबनान के चरमपंथी संगठन हिजबुल्लाह के नेता हसन नसरल्लाह पर साफ़ महसूस होता है.

एक समय था जब राष्ट्रपति बुश ने ईरान को ‘ऐक्सिस ऑफ़ इविल’ यानी ‘दुष्टता की धुरी’ वाले देशों में शामिल किया था. आज इराक़ में सुन्नी चरमपंथियों की बढ़त कम करने के लिए वह ईरान से हाथ मिलाने को तैयार नज़र आता है.

दरअसल ईरान और सऊदी अरब दोनों देश एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं.

शिया-सुन्नी टकराव

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इस खेल के पीछे सुन्नी और शिया टकराव भी है. ईरान ख़ुद को पूरी दुनिया के शियाओं के रहनुमा के तौर पर देखता है जबकि सऊदी अरब सुन्नी इस्लाम के झंडाबरदार की तरह पेश आता है.

सऊदी अरब का इल्ज़ाम है कि हाल में बहरीन में हिंसा के पीछे ईरान का हाथ था. बहरीन में सरकार सुन्नियों की है लेकिन बहुसंख्यक आबादी शिया है.

सऊदी अरब का इल्ज़ाम ये भी है कि इराक में मलिकी को कठपुतली की तरह चलाकर ईरान राज कर रहा है. ईरान दावा करता है कि इराक और सीरिया में सुन्नी चरमपंथियों की सऊदी अरब मदद कर रहा है और शियाओं की हत्याएँ रोकने की कोई कोशिश नहीं कर रहा है.

इराक, सीरिया और लेबनान में शिया-सुन्नी टक्कर में आम लोग पिस कर रह गए हैं और दोनों ओर के चरमपंथी एक दूसरे की हत्या करने में जुटे हैं जिससे इलाके में हिंसा चरम पर पहुँच गई है.

मौलाना मुहम्मद अली जौहर ने करबला की लड़ाई पर एक शेर लिखा था जिसकी आखिरी पंक्ति थी: इस्लाम जिंदा होता है हर करबला के बाद.

ऐसा संभव है कि करबला जैसी इस स्थिति के ख़त्म होने के बाद, इलाके में शांति का एक नया दौर शुरू हो लेकिन फिलहाल ये आसानी से होता नहीं दिखता.

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