'वैचारिक हस्तक्षेप करने वाले व्यक्ति थे अनंतमूर्ति'

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अनंतमूर्ति से मेरी बहुत पुरानी मित्रता थी. अनंतमूर्ति इस समय भारतीय साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकारों में से एक थे. सिर्फ कन्नड़ के कारण नहीं, अपनी अखिल भारतीयता के कारण बहुमान्य थे.

और उन्होंने अपने साहित्य में, गल्प में और कथा शिल्प में जो कुछ भी किया, वह अपनी जगह है और बेहद मह्त्वपूर्ण भी है लेकिन उसके अलावा वो एक आत्मविश्वास से भरे हुए भारतीय भाषाओं के प्रवक्ता भी थे.

उन्होंने ही भारतीय भाषाओं के लिए अंग्रेजी के मुकाबले भाषा शब्द चलाया और भाषा की इस समय जब फिर से सुगबुगी है और भाषाओं का संघर्ष एक नए मुकाम पर पहुँच रहा है.

अनंतमूर्ति का न होना एक बहुत बड़ी क्षति है. लेकिन अनंतमूर्ति ने जीवन भर अपनी आस्था के तहत, उनकी एक व्यापक समाजधर्मी आस्था थी लेकिन उनका व्यक्ति की गरिमा में भी विश्वास था और उनका ये भी विश्वास था कि साहित्य को हमारे समय में जब जरूरी हो हस्तक्षेप करना चाहिए और वो हस्तक्षेप वे जीवन भर करते रहे.

लोहिया- गाँधी से प्रभावित

वो एक ऐसे व्यक्ति थे जिनके जीवन पर गाँधी और राम मनोहर लोहिया दो राजनेताओं का गहरा प्रभाव था. उनमें एक तरफ सादगी थी तो दूसरी तरफ एक तरह की रसिकता थी.

वे लेखक और साहित्यकार तो थे ही लेकिन उनमें एक तरह एक्टिविज्म भी था.

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हमारे समय के ज्यादातर बड़े साहित्यकार किसी न किसी रूप में एक्टिविस्ट भी रहे हैं. यानी सिर्फ अनंतमूर्ति ही नहीं सभी भारतीय भाषाओं में देखें तो उनके बड़े लेखकों में किसी न किसी किस्म का एक्टिविज्म जरूर रहा है.

चूंकि अनंतमूर्ति एक प्रखर वक्ता था और एक बुद्धिजीवी थे. उन्होंने हम पर भारतीयता की जो संकीर्ण परिभाषा लादी जाती रही है, उसका प्रतिरोध करते हुए उसकी एक अधिक समावेधी अवधारणा पेश की थी.

वे वैचारिक हस्तक्षेप करने वाले व्यक्ति थे, एक्टिविस्ट थे. वे सिर्फ नारे लगाने वाले, जुलूस निकालने वाले व्यक्ति नहीं थे. उन्होंने कमर्ठता का एक नया आयाम पेश किया था कि हम वैचारिक हस्तक्षेप करेंगे और जो संकीर्णता और घृणा हम पर थोपी जा रही है, उसका विरोध करेंगे.

( बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित)

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