फ़िल्मों में तब्दील हुआ किताबों का मेला

दिल्ली पुस्तक मेला

कहते हैं कि सिनेमा और साहित्य का चोली-दामन का साथ है. अब बात चाहे 'गाइड' फिल्म की हो, या 'उमराव जान' की या फिर नए दौर में बनी 'पिंजर' और '2 स्टेट्स' की.

दिल्ली के प्रगति मैदान में जारी 20वें दिल्ली पुस्तक मेले ने साहित्य और सिनेमा के इसी रिश्ते को अपनी थीम बनाया है.

दिल्ली पुस्तक मेले की निदेशक वी मीरा ने बताया, "सिनेमा के 100 साल पूरे होने पर दिल्ली में कई कार्यक्रम हुए और उन्हीं कार्यक्रमों के दौरान हमें साहित्य और सिनेमा के आपसी जुड़ाव को लोगों के सामने लाने की जरूरत महसूस हुई."

वे कहती हैं, "साहित्य का सिनेमा से पुराना नाता है और लोगों के सामने इसे न लाना वैसा ही है जैसे किसी रचनाकार की कृति से उसका नाम मिटाना."

इसलिए इस बार मेले में न सिर्फ़ ऐसी किताबें मिल रही हैं जिन पर फ़िल्में बन चुकी हैं बल्कि वो किताबें भी यहां मौजूद हैं जो किसी फ़िल्म की पटकथा को दिखाती हैं जैसे 'लगे रहो मुन्नाभाई' और 'लेजेंड ऑफ़ भगत सिंह'

75 लाख का पेन

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वैसे तो ये मेला पुस्तक प्रेमियों के लिए है लेकिन मेले के एक हिस्से में दर्शकों के लिए कुछ ख़ास आकर्षण भी हैं जिसमें प्रमुख है हीरों से जड़ा 75 लाख का पेन.

हॉल नंबर '12 ए' में लगे एक स्टाल में रखे गए इस पेन को देखने और छूने के लिए पहले ही दिन काफ़ी भीड़ लग गई और सुरक्षा कारणों के चलते आयोजकों को यह पेन प्रदर्शनी से हटाना पड़ा.

मेले का दूसरा आकर्षण बच्चों के लिए उनके मनपसंद किरदार हो सकते हैं. बच्चे यहां नागराज, छोटा भीम और गुड्डू से मिल सकते हैं.

मेले का आकर्षण इसका हाईटेक स्वरूप भी है. किताबों की हर जानकारी और प्रगति मैदान पहुंचने से पहले ही मेले की टिकट भी आप अपने फ़ोन से प्राप्त कर सकते हैं.

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