काग़ज़ नेपाल का, ज़मीन भारत की

  • 31 अगस्त 2014
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भारत और नेपाल के बीच वैसे तो सीमा निर्धारण 26 साल पहले ही हो गया था, लेकिन तब सीमा निर्धारण मेची नदी करती थी.

यानी नदी जिधर भी अपना रुख़ करती थी वही सीमा बन जाता था.

लेकिन अब मानचित्र को सीमा तय करने का मापदंड बनाया गया है.

इससे नई तरह की परेशानियां पैदा हो गई हैं. जिस ज़मीन के लिए दस्तावेज़ नेपाल सरकार ने जारी किए हैं, वो ज़मीन दरअसल अब भारतीय भूभाग है.

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भारत-नेपाल सीमा पर स्थित गांव भंशाखोला के भजन चौधरी अपने आप को बेघर महसूस करते हैं.

उनके पास नेपाल के अधिकारियों की ओर से जारी ज़मीन के मालिकाना हक़ के काग़ज़ तो हैं, लेकिन उनकी ज़मीन भारत में पड़ती है.

उन्होंने बताया, "नेपाल की ओर से जारी दस्तावेज़ मेरे पास हैं, लेकिन अब यह क्षेत्र भारत का हिस्सा है. हम अपने आप को बेघर महसूस करते हैं, हम अब कहां जाएं."

भजन की ज़मीन से पश्चिम की ओर का भूभाग पूर्वी नेपाल के मेचीनगर नगरपालिका के अंतर्गत आता है.

सीमा का निर्धारण

वैसे, दोनों देशों के बीच सीमा का निर्धारण 26 साल पहले हो गया था. स्थानीय इतिहासकारों के मुताबिक़ यह गांव पहले नेपाल का हिस्सा था.

अब यह निश्चित करने के लिए कि यह भूभाग भारत में आता है, यहां पर दो खंभे लगाए गए हैं.

नेपाल के हिस्से में आने वाले मेचीनगर वार्ड नंबर 11 की रहने वाली माया उप्रेती का कहना है कि उनके साथ गांव में रहने वाले लोग अपनी राष्ट्रीयता को लेकर असमंजस में हैं.

उन्होंने कहा, "कौन सा देश हमारे लिए विकास की योजनाएं तय करेगा? इसे लेकर हम चिंतित हैं."

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त्रिभुवन विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग की एसोसिएट प्रोफ़ेसर चिंतामणि दहल का कहना है कि मेची नदी को 1989 से पहले भारत और नेपाल के बीच सीमा के रूप में माना जाता था.

नहीं सुनी गई शिकायतें

उन्होंने कहा, "क्योंकि नदी ही सीमा थी और यह प्राकृतिक कारणों से बदलती रहती है तो नदी के जिस ओर भी लोग रहते थे उधर की ज़मीन उनकी होती थी. लेकिन जब नदी की जगह नक्शे को सीमा निर्धारण का मापदंड बनाया गया तो उन्होंने ये ज़मीन खो दीं.''

भंशाखोला के लोगों की शिकायतें दोनों देशों में से किसी के भी अधिकारियों ने नहीं सुनीं.

झापा इकमानी नेपाल के चीफ़ डिस्ट्रिक्ट ऑफ़िसर का कहना है कि सीमा पर रहने वाले नेपाली नागरिकों को कोई समस्या ना हो, इसे सुनिश्चित करने ले लिए सरकार सारे प्रयास कर रही है.

भंशाखोला केवल एक उदाहरण है. इसके अलावा सीमा पर कई ऐसी जगहें हैं जहां लावारिस भूभाग की पहचान करना भी मुश्किल है.

अनुमान के मुताबिक़ नेपाल के मालिकाना हक़ वाले सर्टिफ़िकेट के बावजूद सैकड़ों एकड़ ज़मीन सीमा निर्धारण के कारण भारत में जा चुकी है.

लेकिन नेपाल सरकार ने इससे संबंधित आधिकारिक आंकड़े अभी तक जारी नहीं किए हैं.

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