आख़िरी ख़तः जब धरती मरे लोगों से भर गई!

प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने वाले भारतीय सैनिक इमेज कॉपीरइट Other

"इन बमों को झेल पाना बहुत मुश्किल है पिताजी... गोलियाँ और तोप के गोले इस तरह बरसते हैं जैसे बर्फ़! हमारा आधा जिस्म कीचड़ में होता है. हमारे और दुश्मन के बीच 50 गज़ की दूरी है... मारे गए लोगों की गिनती नहीं की जा सकती है..."

ये अंश है एक पत्र का, जो एक भारतीय सैनिक ने 1915 में फ़्रांस के मोर्चे से अपने पिता को लिखा था.

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ब्रितानी लायब्रेरी ने हाल ही में तत्कालीन ब्रितानी सैनिक सैंसर द्वारा कॉपी किए गए भारतीय सैनिकों के उन हज़ारों पत्रों को सार्वजनिक किया है, जिसमें उन्होंने युद्ध के मोर्चे के अपने ज़बरदस्त अनुभवों को साझा किया है.

रेहान फ़ज़ल की विवेचना

इन पत्रों में भारतीय सैनिक ब्रितानी सरकार की ओर से उन्हें दिए जा रहे भोजन और कपड़ों के लिए आभार प्रकट करते हैं.

1914 में एक धर्मार्थ संस्था इंडियन सोल्जर्स कंफ़र्ट फंड (आईसीएस) बनाई गई थी और उसे अस्पतालों में रह रहे घायल भारतीय सैनिकों की देखभाल की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी.

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एक सिपाही अपने घर भेजे गए ख़त में लिखता है, "मेरे बारे में चिंता मत करिए. मैं जन्नत में हूँ... पिछले हफ़्ते राजा यहाँ आए थे. उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया और हम में से हर एक से हमारी चोट और तकलीफ़ के बारे में पूछा और हमारा हौसला बढ़ाया."

"आज मैं एक अजायबघर देखने गया, जहाँ दुनिया की सारी मछलियों को ज़िंदा पानी के बक्से में रखा गया है. हमने एक राजमहल भी देखा, जिसकी क़ीमत करोड़ों पाउंड है."

बेमिसाल पेरिस!

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घायल भारतीय सैनिकों के लिए एक राजमहल ब्राइटन पेवेलियन को अस्पताल में बदल दिया गया था.

ग्रामीण क्षेत्र से आने वाले इन सैनिकों के लिए यूरोपीय शहरों जैसे लंदन, ब्राइटन और पेरिस के दृश्य किसी आश्चर्य से कम नहीं थे.

एक सैनिक ने लिखा, "क्या ख़ूबसूरत शहर है! बेहतरीन बगीचे, नदियाँ, तालाब, घर, दुकानें, सड़कें, गाड़ियां, गाय, घोड़े और बत्तख़ें... आचरण, तहज़ीब, अनुशासन और तेज़ी.... सब कुछ बेमिसाल है."

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पेरिस से एक सैनिक ने लिखा, "पेरिस क्या है? ये स्वर्ग है!"

कहीं-कहीं शिकायतों के स्वर भी मिलते हैं, "जहाँ तक रोटियों की बात है, नानबाई इसके किनारों को ज़रूरत से ज़्यादा जला देते हैं और कभी कभी ये अंदर से कच्ची रह जाती हैं."

उस ज़माने में सर छोटू राम, जाट गज़ेट निकाला करते थे, जिनमें इन सैनिकों की चिट्ठियाँ छपा करती थीं.

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मशहूर सैन्य इतिहासकार राणा छीना कहते हैं, "एक रिसालदार टेकचंद थे, उन्होंने लिखा है कि हम दुआ कर रहे हैं कि हम जिस मुसीबत में फंसे हैं उसमें ताउम्र फंसे रहें ताकि जिन सैनिकों को बाहर जा कर दुनिया देखने का मौक़ा मिल रहा है, वो उनको मिलता रहे और उनकी आँखें खुलें."

"जब ये लोग बाहर गए तो उन्होंने देखा कि फ़्रांस में किस तरह औरत मर्दों के साथ कंधे से कंधा मिला कर काम करती हैं, स्वास्थ्य का किस तरह से ध्यान रखा जाता है. जब वो लौट कर आए तो ये सब चीज़ें सीख कर आए."

वो बताते हैं, "उन चिट्ठियों में ज़िक्र होता है कि हमें अपनी बेटियों को पढ़ाना चाहिए. वो लिखते हैं कि हम सब एक ही मेज़ पर बैठ कर खाना खा रहे हैं. ये उस ज़माने के लिए बड़ी बात थी, जहाँ हिंदू पानी और मुस्लिम पानी अलग-अलग होता था."

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हरियाणा संस्कृति और इतिहास अकादमी के निदेशक केसी यादव कहते हैं कि जाट गज़ेट में इन सैनिकों के पत्र छपा करते थे. वहाँ इन्होंने चकाचौंध देखी, अमीरी देखी और समझने की कोशिश की कि वो क्यों अमीर हैं और हम ग़रीब क्यों हैं.

यादव बताते हैं, "उन्होंने रोहतक में बनने वाले बोर्डिंग हाउस के लिए पैसे जमा किए हैं. दूसरी चिट्ठी में ज़िक्र है कि हमने हर सिपाही की तन्ख़्वाह से हर रुपए पर एक आना लेकर इस काम के लिए चार सौ रुपए जमा किए हैं. ये उस ज़माने में बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी.

सेंसर की ज़रूरत

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डेविड ओमेसी अपनी किताब 'इंडियन वॉयसेज़ ऑफ़ द ग्रेट वॉर' में लिखते हैं कि इन पत्रों को दो स्तरों पर सेंसर किया जाता था.

एक तो रेजिमेंट के स्तर पर जहाँ या तो ब्रितानी अफ़सर स्वयं इन पत्रों को पढ़ते थे या इन्हें वफ़ादार भारतीय अफ़सरों से ज़ोर-ज़ोर से पढ़वाते थे. ऐसा इसलिए किया जाता था कि इन ख़तों में सैनिक महत्व की कोई सामरिक सूचना न चली जाए.

इसके बाद बोलोन में सेंसर टीम का प्रमुख दोबारा इन पत्रों को पढ़ कर ये तय करता था कि इन पत्रों को उसी हालत में आगे भेजा जाए या नहीं. अवांछित हिस्सों पर काली स्याही फेर दी जाती थी, ताकि कोई इन्हें पढ़ न सके.

दिलचस्प बात ये है कि भारतीय सैनिकों को भी पता होता था कि उनके पत्रों को सेंसर किया जा रहा है. कई बार तो वो सेंसर को ही संबोधित करत हुए लिखते थे, "उम्मीद है, सेंसर चचा इस पत्र को सुरक्षित आगे बढ़ाएंगे."

तीस मन के गोले

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ये पत्र ज़्यादातर उर्दू में लिखे गए हैं. वैसे गुरमुखी, हिंदी, मराठी और गढ़वाली भाषा में भी लिखे हुए पत्र भी मिलते हैं.

इन पत्रों में सैनिक अक्सर युद्ध की विभीषिका का ब्योरेवार वर्णन करते हैं. एक सैनिक लिखता है, "ज़हरीली गैसें, बम, मशीन गन जो प्रति मिनट 700 गोलियाँ दाग सकती है... छोटी और बड़ी तोपें जो 30 मन के गोले दागतीं हैं.. उड़ने वाली मशीनें जो हवा से बम गिराती हैं."

एक और सैनिक अपने घर लिखता है, "यहाँ से कोई साबुत पंजाब नहीं लौट सकता. सिर्फ़ हाथ-पैर तुड़वा कर ही लोग वापस लौट सकते हैं."

राइफ़ल मैन अमर सिंह रावत अपने दोस्त को लिखते हैं, "धरती मरे हुए लोगों से भर गई है. कोई भी जगह ख़ाली नहीं बची है. आगे बढ़ने के लिए लाशों के ऊपर से होकर जाना होता है...यहाँ तक कि उनके ऊपर सोना भी होता है... क्योंकि कोई ख़ाली जगह बची ही नहीं है."

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'द वीक' पत्रिका की संवाददाता मंदिरा नैयर ने भी इन पत्रों पर ख़ासा शोध किया है. मंदिरा कहती हैं कि ये पत्र सही मायनों में युद्ध पत्रकारिता का बेहतरीन उदाहरण हैं.

मंदिरा कहती हैं, "भारतीय सैनिकों के भेजे गए विवरण वास्तविक और काव्यात्मक हैं. बहुत दर्द भरे भी हैं. एक 18 साल का लड़का लिखता है कि उसने इतनी लाशें देखीं हैं कि अगर वो ज़िंदा भी वापस आ जाए तब भी ये नज़ारा कभी नहीं भूलेगा."

"कुछ पत्र ऐसे हैं जिन्हें ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि वो भारत पहुंचें... जैसे कि किंग जॉर्ज हमें कितना चाहते हैं. हम उनके राजमहल में ठहरे हुए हैं जिसे उन्होंने हमारे लिए ख़ाली कर दिया है."

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"हम आजकल युद्ध साहित्य या पत्रकारिता के बारे में बहुत बात करते हैं, लेकिन असली युद्ध पत्रकारिता तो इन सैनिकों ने दिखाई थी..."

कई पत्रों में अवसाद की झलक साफ़ दिखती है, "पता नहीं ये लड़ाई दो साल चलेगी या तीन साल. यहाँ एक घंटे में 10,000 लोग मारे जा रहे हैं. इस से ज़्यादा मैं और क्या लिख सकता हूँ..."

जर्मन विमान गरुड़ जैसे

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कई पत्रों में जर्मन लड़ाकू विमानों की तुलना विष्णु के गरुड़ से की गई है.

बंकर का वर्णन करते हुए एक सैनिक लिखता है, "यहाँ कीचड़ आदमी के घुटनों तक है और गड्ढों में जहाँ हम खड़े होकर लड़ रहे हैं दो फ़ुट तक पानी भरा हुआ है."

"जिस तरह खजूर के पेड़ को हिलाने से सारे खजूर ज़मीन पर गिर जाते हैं, उसी तरह लोगों की लाशों का अंबार यहाँ लग गया है."

पश्चिमी देशों के सामाजिक परिवेश पर भी इन सैनिकों की नज़र गई है. स्त्री पुरुष संबंधों को लेकर उनकी सांस्कृतिक ऊहापोह को आसानी से समझा जा सकता है.

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छठी केवेलरी के तारा सिंह, सरदार करबर सिंह को लिखते हैं, "यहाँ भाई और बहन के बीच कुछ भी छिपा नहीं है. अगर भाई की महिला दोस्त घर आती है तो बहन और माँ ख़ुश होती हैं."

"अगर माँ या बहन का पुरुष मित्र घर आता है तो बेटा ख़ुश होता है. यहाँ लोग वही करते हैं जो उनका दिल चाहता है... कोई रोक-टोक नहीं. लोग हर चीज़ खाते हैं..."

"गधा, कुत्ता, घोड़ा, सुअर, गाय... किसी के भी खाने पर रोक नहीं है. वो अपना हर काम ख़ुद करते हैं... यहाँ तक कि अपने कमोड की सफ़ाई भी!"

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एक सिख सैनिक चाय पीने की तुलना अमृत पीने से करता है.

इन पत्रों की भावनात्मक ताक़त इस लिहाज़ से बढ़ जाती है क्योंकि उनमें उन घटनाओं का ज़िक्र है जो वास्तव में घटी हैं और जिनके चश्मदीद गवाह ये पत्र लिख रहे हैं.

उनको इसका अंदाज़ा है, तभी तो एक घायल सैनिक अपने भाई को पत्र लिख रहा है, "मेरे भाई पत्र समाप्त करता हूँ. कुछ दिनों में मैं फिर मोर्चे पर चला जाउंगा... अगर जिंदगी रही... तो फिर लिखूंगा!"

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