बच्चों के सहारे छपेंगी 32 करोड़ किताबें

  • 4 सितंबर 2014
बांग्लादेश पाठ्यपुस्तक प्रकाशन

बांग्लादेश टेक्स्टबुक बोर्ड इस वर्ष 32 करोड़ से ज़्यादा पाठ्यपुस्तकें प्रकाशित कर रहा है. इन पुस्तकों को अगले साल जनवरी में एक से नौ तक के छात्रों के बीच मुफ़्त में बांटा जाएगा.

इन पुस्तकों के एक बड़े हिस्से की छपाई पुराने ढाका के बांग्ला बाज़ार और आस-पास के इलाक़ों में होती है.

इस समय यहां प्रिंटिंग सीज़न पूरे उफ़ान पर है. प्रिंटिंग प्रेस और बुक बाइंडिंग फ़ैक्ट्रियों में आधे कामगार बाल श्रमिक हैं. स्कूल न जा पाने वाले ये बच्चे अपनी ही उम्र के बच्चों के लिए पाठ्य पुस्तकें तैयार करने में 14 से 15 घंटे काम करते हैं.

पढ़ें शहनाज़ परवीन की पूरी रिपोर्ट

पुराने ढाका के बांग्ला बाज़ार में आजकल लगभग हर फ़ैक्ट्री में छपे हुए काग़ज़ों और किताबों का अंबार लगा हुआ है. इन्हें ले जाने वाले रिक्शे व्यस्त हैं. मोहम्मद शागोर पंद्रह दिन पहले यहां एक प्रिंटिंग फ़ैक्ट्री में ट्रेनी के तौर पर काम करने आए थे.

वो बताते हैं, ''मेरा ख़र्च उठाने में अक्षम मेरे परिजनों में मुझे यहां काम करने के लिए भेजा था. मैं यहां सीखने आया था. पंद्रह दिन में ही मैंने काग़ज़ों को मोड़ना सीख लिया था और अब मैं मशीन भी चला सकता हूं.''

इस इलाक़े में काम करने वाले चौदह वर्षीय शागोर अकेले लड़के नहीं हैं. यहां आने वाला हर लड़का ग़रीबी के कारण आता है.

कुछ साल पहले मोहम्मद बाबुल का घर नदी के कटाव में बह गया और उनके पिता किसी अज्ञात बीमारी में चल बसे. इन परिस्थितियों ने उनकी मां को उन्हें काम पर भेजने को मजबूर किया.

बाबुल कहते हैं, ''पिता और फिर घर खोने के बाद कुछ समय तक हम इधर-उधर भटकते रहे. उसके बाद मैं यहां काम करने आ गया.''

उन्होंने तीसरी तक पढ़ाई की है लेकिन अब वो छठी के छात्रों के लिए किताबें छापने में मदद कर रहे हैं.

वो कहते हैं, ''ये किताबें अलग-अलग ज़िलों में जाएंगी, मेरे ज़िले में भी. अन्य बच्चे इन्हें पढ़ेंगे इसलिए बुरा लगता है कि मैं इन क़िताबों को नहीं पढ़ पाउंगा. इसकी बजाय मुझे काम करना है.''

फ़ैक्ट्री ओनर्स एसोसिएशन का कहना है कि इस इलाक़े में 500 प्रिंटिग प्रेस और 300 बुक बाइंडिंग फ़ैक्ट्री हैं, जिनमें आधे मज़दूर बच्चे हैं.

ये बच्चे इन भरे हुए कमरों में काम करते हैं, जहां सूरज की रोशनी कभी नहीं पहुंचती.

जब हम बाबुल से मिले तो बाबुल विज्ञान की क़िताब को सूई और धागे से सी रहे थे.

परिजन ही भेजते हैं

वो कहते हैं, ''पहले पहल मैं मालिकों के लिए चाय पहुंचाने का काम करता था. धीरे धीरे मैंने काम सीख लिया. अब मैं किताबों को सी सकता हूं या गोंद से चिपका सकता हूं. कभी कभी तो मैं काग़ज़ काटने वाली मशीन भी चलाता हूं.''

हर साल कटिंग मशीन से किसी न किसी की अंगुली कट जाती है. फिर इन बच्चों को उनके घर वापस भेज दिया जाता है.

बाबुल जहां काम करते हैं वहां से कुछ ही दूरी पर एक अन्य बाइंडिंग फैक्ट्री है.

बारह साल के मोहम्मद शहिदुल कहते हैं, ''मैं पढ़ाई नहीं करना चाहता था इसलिए मेरी मां ने कहा, यदि तुम स्कूल नहीं जाना चाहते तो काम करो. अब मैं सुबह सात बजे से रात 10 बजे तक काम करता हूं. दोपहर में एक घंटे का लंच होता है.''

शहिदुल को लगता है कि उन्हें स्कूल जाना चाहिए था. शाहिदुल जैसे बच्चों को प्रशिक्षु के तौर पर प्रतिमाह 1200 से 1500 टका (900 से 1200 रुपए) मिलता है.

एक अन्य बाल श्रमिक अली इमरान कहते हैं, ''चार वर्ष बाद अब मैं हर महीने तीन हज़ार टका (2400 रुपए) कमा लेता हूं.''

ग़रीबी है मज़बूरी

वो कहते हैं, ''मालिक ने घर और खाने का बंदोबस्त कर दिया है. मैं दो हज़ार टका घर भेज देता हूं. मैं आत्मनिर्भर महसूस करता हूं.''

फ़ैक्ट्री मालिक मोहम्मद अब्दुल क़ुद्दूस कहते हैं कि बच्चे जब घर पैसा भेजते हैं तो अन्य परिवार भी अपने बच्चों को इस उद्योग में भेजने के लिए प्रोत्साहित होते हैं.

वे अपने पड़ोसियों या रिश्तेदार के साथ आते हैं लेकिन कभी-कभी मालिक इन्हें अपने गांव से खुद लाते हैं.

क़ुद्दूस ने बताया, ''जहां से मैं हूं, वहां नदी का कटाव बहुत ज़्यादा है. कुछ-कुछ सालों पर लोग अपना घर गंवा देते हैं. अधिकांश घरों में कमाने वाला केवल एक व्यक्ति होता है. इसलिए वे अपने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर देते हैं. परिजन मुझसे खुद ही बच्चों को काम पर ले जाने को कहते हैं.''

हालांकि शागोर या शाहिदुल जैसे बच्चों का कहना है कि उन्हें याद नहीं कि पिछली बार कब उन्होंने खेला था. जिस छोटी जगह वे काम करते हैं वहीं वे खाते और सोते हैं.

किताबों से ठुसी जगह में वे अपने दिन बिताते हैं लेकिन वे इन्हें कभी नहीं पढ़ पाएंगे.

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