'आईएस से है अल क़ायदा का मुक़ाबला'

ओसामा बिन लादेन और अयमन अल ज़वाहिरी इमेज कॉपीरइट AP

अल क़ायदा ने भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी शाखा खोलने की बात कर हलचल मचा दी है. लेकिन पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार रहीमुल्लाह यूसुफ़ज़ई का कहना है कि भारत को इससे ज़्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है.

अल क़ायदा नेता अयमन अल ज़वाहिरी की ओर से इस तरह का वीडियो काफ़ी अर्से के बाद आया है. मैं इसको एक प्रॉपेगेंडा भी समझता हूँ और एक पागलपन भी. अल क़ायदा का असल गढ़ अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान था और यहां पर यह बहुत कमज़ोर हो गया है.

इससे मिलती जुलती सोच रखने वाले संगठनों ने मध्य पूर्व एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाया है लेकिन वो पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में कमजोर हुए है. हां वे यहां से ख़त्म नहीं हुए.

अल क़ायदा को बनाने वाले ओसामा बिन लादेन ने भी कुछ मौक़ों पर कश्मीर का ज़िक्र किया था. भारत और कश्मीर में अपना प्रभाव बढ़ाने की उनकी हमेशा कोशिश रही है लेकिन वे कभी कामयाब नहीं हुए.

इसलिए ये उनकी एक नई कोशिश है. दूसरी बात यह है कि इस्लामिक स्टेट (आईएस) की वजह से इन्हें मध्य पूर्व में नुकसान पहुंचा है.

उन्हें चिंता है कि कहीं यहां अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में भी ऐसा ना हो और वो इनसे आगे ना निकल जाए. इसलिए यह कोशिश की गई है.

नहीं मिलेगी कामयाबी

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पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में तो ये स्थानीय चरमपंथी संगठनों पर निर्भर है. इनको कभी ऐसी ताक़त हासिल नहीं हुई जैसी आज आईएस की है.

अफ़ग़ानिस्तान में भी जब ये थे तो तलिबान के बलबूते पर थे. इन्होंने अपनी अपील में उन जगहों का ज़िक्र किया है जहां मुसलमान अल्पसंख्यक है और किसी ना किसी वजह से वो नाराज़ हैं.

इसको ये भुनाना चाहते हैं लेकिन उन्हें पहले भी इसमें कामयाबी नहीं मिली थी और मैं समझता हूँ इस बार भी नहीं मिलेगी.

हालांकि अलर्ट तो रहना चाहिए. ये देखना होगा कि कौन सा संगठन है जिनकी हमदर्दी इनके साथ हो सकती है क्योंकि इनकी मौजूदगी भारत में नहीं है. इसलिए किसी के सहारे ही कोशिश करेंगे.

मज़बूत जम्हूरियत हैं बाधक

अल क़ायदा लंबे अर्से से सक्रिय है लेकिन आईएस ने जो काम कर दिखाया वो ये नहीं कर सके हैं. आईएस में शामिल होने भारत से एक नौजवान गया भी और मारा भी गया.

यह कामयाबी आज तक अल कायदा को नहीं मिली है. इसलिए यह एक मुकाबले की तरह है इन दोनों में.

भारत में मज़बूत लोकतंत्र की वजह से इस तरह की संगठनों को वहां कामयाबी नहीं मिल पाती है. इसलिए भारत को बहुत फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है.

हालात का फायदा उठाने के मकसद से हिंदूवादी रूझान वाली सरकार के होने की बात उनकी जेहन में तो होगी. इस लिहाज से उनकी यह पहल महत्वपूर्ण है.

(बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित)

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