क्या प्रधानमंत्री मोदी बनेंगे चाचा मोदी?

  • 5 सितंबर 2014

अहमदाबाद के एक अंतरराष्ट्रीय स्कूल के बच्चों से मैं मिला जो 16 से 17 वर्ष के थे.

ये लड़के और लड़कियां गुजराती और हिंदी से अधिक अंग्रेज़ी में मेरे सवालों का जवाब देने में सक्षम थे. भाषा और जीवनशैली से वे अमीर घरों के मालूम होते थे.

लेकिन सभी मोदी भक्त थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में 100 दिन पूरे होने पर उनके विचार पूछने पर लगभग सभी ने कहा कि प्रधानमंत्री उन जैसे युवाओं से जुड़े हैं और राहुल गांधी युवा होते हुए भी उनसे कनेक्शन नहीं बना पाए.

ऐसे में नरेंद्र मोदी का शिक्षक दिवस पर पूरे देश के छात्रों को लाइव टेलीकास्ट से सम्बोधित करना समझ में आता है. एक मंझे और अनुभवी आरएसएस प्रचारक की तरह वे 'कैच देम यंग' के विचार पर यक़ीन रखते हैं.

महागुरु मोदी दिवस

पांच सितंबर को शिक्षकों को उच्च आसन पर बिठाया जाता है. अब अगर महागुरु ही करोड़ों विद्यार्थियों से सीधे बात कर सकते हैं तो इन शिक्षकों का क्या महत्व रह गया है, केवल महागुरु के पैग़ाम पहुँचाने की तैयारी में मदद करना तो नहीं रह गया?

ये भी संभव है कि शिक्षक दिवस के बजाए 'महागुरु मोदी दिवस' के नाम से जाना जाए. दूसरी बात यह कि युवाओं से सीधे कनेक्ट होने का स्कूलों से बड़ा कोई और प्लेटफ़ॉर्म नहीं हो सकता था.

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सोशल मीडिया भी एक साधन है जिसका इस्तेमाल मोदी पहले से ही कर रहे कर रहे हैं. लेकिन पूरे देश के स्कूली बच्चों से सीधे रूबरू होने के लिए इससे बेहतर कोई साधन नहीं है. इसे कहते हैं एक तीर से दो शिकार.

स्वतंत्र भारत के इतिहास में नरेंद्र मोदी का ये क़दम जितना अनोखा है उतना ही विवादास्पद भी. अब तक किसी और प्रधानमंत्री ने इस प्लेटफ़ॉर्म को इस्तेमाल करने के बारे में नहीं सोचा. शायद ऐसा करने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते क्योंकि शिक्षक इसका सख़्ती से विरोध करते.

बच्चों पर असर

हज़ारों शिक्षकों ने मोदी के विवादास्पद क़दम का विरोध किया है. उनका कहना है कि पांच सितंबर का दिन शिक्षकों के गौरव का दिन है जिसे प्रधानमंत्री हड़पना चाहते हैं. उनके मुताबिक़ मोदी महागुरु नहीं हैं और उन्हें अपने कार्यक्रम को सुनने के लिए बच्चों को मजबूर नहीं करना चाहिए.

मोदी सरकार की सफ़ाई है कि बच्चों और शिक्षकों को प्रधानमंत्री का प्रसारण देखना अनिवार्य नहीं है लेकिन सरकारी दफ़्तरों से जिस तरह के लिखित आदेश भेजे गए हैं और बाद में ग़ैर लिखित आदेश दिए गए, उससे महसूस होता है कि इसमें शामिल न होना विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए समस्या पैदा कर सकता है.

इसलिए देश भर के स्कूलों ने मोदी के भाषण को दिखाने के लिए पूरी तैयारी कर ली है. निजी स्कूलों ने भी इसका इंतज़ाम किया है.

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अब देखना यह है कि मोदी के भाषण का इन बच्चों पर किस तरह का असर होता है. क्या बच्चे उन्हें चाचा मोदी कहेंगे या महागुरु मोदी? शिक्षकों की सोच क्या होगी? क्या वो उन्हें महागुरु का दर्जा देंगे या फिर उनके डर के मारे ख़ामोश रहेंगे?

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