100 दिन बाद क्या है मोदी के बनारस का हाल?

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बनारस एक संस्कार है, बनारस एक संस्कृति है.

बनारस की आदतें हैं, स्वभाव है और उसका प्रभाव है!

इस तरह की बातें सुनने को मिलती हैं वाराणसी में जब लोगों से नए सांसद नरेंद्र मोदी के शहर को एक 'मॉडल सिटी' बनाने की योजना पर बात होती है.

नितिन श्रीवास्तव का विश्लेषण

नरेंद्र मोदी को बतौर प्रधानमंत्री बने 100 दिन हो चुके हैं, जिसे बहुत लंबा समय भी नहीं कहा जा सकता.

लेकिन शहर में कुछ समय व्यतीत करने पर बदलाव की नींव भी पड़ती नहीं दिखी.

कुछ बुनियादी चीज़ें जस की तस हैं.

यातायात

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आंकड़ों की मानें तो तीर्थ-स्थली कही जाने वाली काशी नगरी की आबादी लगभग 35 लाख है.

घनत्व के हिसाब से ये शहर लगभग 15-17 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है.

लेकिन ग़ौर करने वाली बात ये भी है कि इसी जगह पर क़रीब डेढ़ लाख छोटे और बड़े वाहन भी मौजूद हैं.

प्राचीन बानरस की गलियों में हालात ठीक वैसे हैं जैसे पहले थे.

संकरी गलियों की कल्पना लोगों के चलने-फिरने के लिए की गई थी और अब यहाँ पैर रखने की जगह मिलनी मुश्किल है.

शहर में एक बड़ी मुसीबत है संकरी सड़कें और दुकानें जो सड़कों के मुहाने तक पहुँच चुकी हैं.

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शहर के मूल निवासी भी गोदौलिया, लंका, सिगरा, चौक और चेतगंज जैसे भीड़-भाड़ वाले इलाकों में जाने से कतराने लगे हैं.

आम लोगों को नए सांसद से उम्मीद तो है लेकिन एक शंका के साथ.

शहर के वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य कहते हैं, "सैलानियों और भक्तों के साथ शहर में ग्रामीण लोग रोज़गार की तलाश में आते हैं. आप सड़कों को खाली कैसे कर सकेंगे जब ये शहर मात्र तीन से चार लाख लोगों के लिए ही बना था."

बनारस के घाट

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केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय की टीमें पिछले 100 दिन में कम से कम दो बार घाटों का मुआयना कर चुकीं हैं.

इन दिनों घाटों पर बाढ़ से आई मिट्टी ने हालात और ख़राब कर दिए हैं.

मणिकर्णिका घाट- जहाँ शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है- पहले जैसा ही है और अस्सी घाट और दशाश्वमेध घाट पर स्थानीय लोग ज़रा भी फेर-बदल की योजना पर उग्र हो उठते हैं.

कुछ दिन पहले एकाएक चंद घाटों पर प्राइवेट सुरक्षा गार्ड दिखे थे जो साफ़-सफ़ाई पर निगरानी रख रहे थे. ये गार्ड महीना भर भी नहीं टिक पाए.

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बनारस से कांग्रेस विधायक और नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने वाले अजय राय का मत है कि घाटों पर बदलाव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

उन्होंने कहा, "हमारे शहर की पहचान हैं घाट और उनसे सटे हुए प्राचीन मंदिर. सदियों से ऐसा ही है और ऐसा ही रहना चाहिए वरना लोगों की आस्था पर हमला समझा जाएगा."

नरेंद्र मोदी के लिए ये सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि बनारस की सम्पूर्ण आस्था का नाता इन घाटों से हैं जहाँ पूजा-अर्चना और स्नान होता है.

बिजली से बेहाल

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यूं तो लगभग पूरे उत्तर प्रदेश में बिजली आपूर्ति बेहाल है लेकिन स्थानीय लोग इसका ठीकरा अपने सांसद के सर ही फोड़ना चाहते हैं.

चुनाव के दौरान शहर में बिजली कटौती बंद सी हो गई थी लेकिन इन दिनों आठ से 10 घंटे की कटौती सामान्य है.

मोदी के वोटर इस बात पर भी ख़फ़ा हैं कि पड़ोस में मुलायम सिंह यादव के संसदीय क्षेत्र आज़मगढ़ में बिजली की कटौती बनारस से कम है.

वाराणसी में बिजली की अधिकतर आपूर्ति अनपरा और ओबरा थर्मल पावर प्लांट से होती है, जिनकी हालत खस्ताहाल बनी हुई है.

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लोग समाजवादी पार्टी सरकार पर 'सौतेले व्यवहार' का आरोप भी मढ़ते हैं.

वाराणसी संसदीय क्षेत्र की क़रीब 60 फ़ीसदी आबादी साड़ी और बुनकरी के कारोबर में जुटी और कारोबारी ख़फ़ा हैं कि बिजली की कटौती उन्हें नुकसान पहुंचा रही है.

बिजली की किल्लत को लेकर राज्यपाल से मिल चुके भाजपा के स्थानीय विधायक रविंद्र जायसवाल कहते हैं, "बिजली पर इलाके के सांसद का कोई ज़ोर नहीं चलता और ये राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है. सांसद को क्यों दोष देना जब मामला राजनीति से प्रेरित है."

सफ़ाई

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आम चुनावों में ऐतिहासिक जीत के बाद जब नरेंद्र मोदी गंगा आरती के लिए घाट पर पहुंचे थे तो अपने सम्बोधन में उन्होंने गंगा के साथ-साथ शहर को स्वच्छ कर दिखाने की बात को दोहराया था.

लेकिन हक़ीक़त ये है कि 100 दिन पूरे होने के बाद भी शहर में न तो कहीं साफ़-सफ़ाई की मुहिम शुरू हुई है और न ही किसी इलाके में कूड़े के ढेरों की ऊँचाई कम हुई है.

शहर के बीचोंबीच गोदौलिया चौराहे के पास वाले गिरजाघर के पीछे खड़े होने की जगह आज भी नहीं है क्योंकि वहां नगर महापालिका की गाड़ी दिन में दो बार कूड़ा-करकट खाली करती है.

शहर के आस-पास पांच रेलवे स्टेशनों के नवीनीकरण की योजना तो बन रही है लेकिन इनके सामने से बहने वाले नालों का पानी और काला होता जा रहा है.

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बनारस हिन्दू विश्विद्यालय में राजनीति शास्त्र विभागाध्यक्ष कौशल किशोर शर्मा ने कहा, "बनारस की जीवन-शैली कूड़े से नहीं यहाँ की गलियों से भांपी जाती है. मोदी जी क्या-क्या बदलेंगे? आप उद्योग, लकड़ी के खिलौने और यहाँ की भांग-पान पर ध्यान देंगे तो ज़्यादा सफल होंगे. मेरी नज़र में तो अभी तक कुछ नहीं बदला है."

आखिरकार बनारस में होने वाले अपेक्षित बदलाव और नरेंद्र मोदी की दुविधा को अमिताभ भट्टाचार्य ने एक पंक्ति में कह डाला.

"हर घर लंका, हर घर रावण, इतने राम कहाँ से लाऊँ मैं."

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