नई विदेश नीति मोदी का मास्टरस्ट्रोक?

  • 6 सितंबर 2014
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नरेंद्र मोदी ने अपने शपथग्रहण समारोह के लिए जब सार्क देशों के नेताओं को न्योता भेजा तो जानकारों ने उसे मोदी की विदेश नीति का मास्टरस्ट्रोक बताया.

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अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए मोदी ने पड़ोसी देश भूटान को चुना. बाद में वह नेपाल भी गए.

पड़ोसियों से संबंध

क्षेत्रीय देशों की तरफ बढ़ाए गए हाथ को रिश्तों में गर्माहट लाने की एक सकारात्मक पहल के तौर पर देखा गया. पर क्या यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मास्ट्रस्ट्रोक है?

भारत के पूर्व राजनयिक राजीव डोगरा कहते हैं, "आजतक इस क्षेत्र में ऐसी कोई पहल नहीं की गई थी और न ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कभी इतनी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली. उसके बाद प्रधानमंत्री नेपाल और भूटान गए. सुष्मा स्वराज म्यांमार गईं. तीनों जगह वही सकारात्मकता देखने को मिली."

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शपथ ग्रहण के लिए मोदी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को भी न्योता दिया था.

नवाज़ शरीफ़ आए और दोनों नेताओं के बीच तोहफ़ों का आदान-प्रदान भी हुआ. लगा बातचीत का मामला आगे बढ़ेगा, पर भारत-पाकिस्तान वार्ता रद्द होना कुछ और ही संकेत दे रहा है.

इस्लामाबाद में मौजूद पाकिस्तान के पूर्व राजनयिक अज़ीज़ खान कहते हैं, "मेरा ख़्याल था कि यह ऐसा मौक़ा है, जिस पर हमारे यहां मुकम्मल राजनीतिक समझदारी है कि भारत के साथ संबंध ठीक करने चाहिए. कहीं कोई राजनीतिक विरोध नहीं है इस पर. दूसरी तरफ़ मोदी सरकार भी पूर्ण बहुमत की सरकार है तो एक उम्मीद जगी थी लेकिन यह जो वार्ता रद्द हुई है, वह बहुत मामूली चीज़ पर हुआ है. ऐसा कहें कि बात का बतंगड़ बना दिया गया."

जापान यात्रा

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प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्रा भी कई मायनों में सफल रही. जानकारों के अनुसार जापान के साथ सामरिक और व्यापारिक रिश्तों में नई ताज़गी आई है.

लेकिन प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी के लिए ब्रिक्स सम्मेलन पहला अंतरराष्ट्रीय मंच था.

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अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विदेशी नीति के कई जानकार मानते हैं कि इस सम्मेलन को मोदी उतना नहीं भुना पाए, जितना वह भुना सकते थे.

ब्रिक्स सम्मेलन

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लेकिन नए ब्रिक्स बैंक का पहला अध्यक्ष भारतीय होने का फ़ैसला उनके पक्ष में रहा.

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वरिष्ठ पत्रकार सिद्दार्थ वरदराजन कहते हैं, "ब्रिक्स सम्मेलन में लिए जाने वाले 90-95 फ़ीसदी फ़ैसले पहले से लिए जाते हैं. पहले ही एक आम सहमति बना ली जाती है. कभी-कभी जो चीज़ें रह जाती हैं उन्हें सम्मेलन में सुलझाया जाता है. किसी भी देश की मोदी के बारे में जो भी सोच हो, उसे परे रखकर ही उन्हें भारत के साथ समझौता करना होगा."

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नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पहले सौ दिनों में यह साबित करने की पूरी कोशिश की है कि वो जितने सक्रिय देश में हैं, उतने ही सक्रिय अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी.

ऐसे में अहम होगा यह देखना कि आने वाले दिनों में उनकी विदेश नीति क्या रुख़ अख्तियार करेगी, ख़ासकर अमरीका के साथ, जहां वह अगले कुछ हफ़्तों में जाने वाले हैं.

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