वो 8 कारण जिनसे नायाब बनी मोदी की पहल

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिक्षक दिवस के मौके पर देश भर के स्कूली बच्चों को दिल्ली के मानेकशॉ ऑडिटोरियम से संबोधित कर एक नायाब कदम उठाया है.

इसकी कई हलक़ों में आलोचना हुई, पर मोदी ने वो हासिल किया जिसे करने की कोशिश आरएसएस सालों से करता रहा है.

शुक्रवार को उन्होंने जिन लाखों छात्रों को संबोधित किया, उनमें से अनेक अगले आम चुनाव में वोटर होंगे.

मतलब साफ है - उनका निशाना यूवा थे.

मोदी का ये क़दम नायाब क्यों है ? ज़ुबैर अहमद का ब्लॉग

नरेंद्र मोदी अब तक प्रधानमंत्री थे, लेकिन आज के बाद वो ‘चाचा’ मोदी बन सकते हैं और हो सकता है कुछ उन्हें 'महागुरु' भी कहें.

कोई इस कार्यक्रम को 'मोदी की पाठशाला' कह कर चुटकी ले रहा था तो कोई एक बड़ा 'स्टेज्ड' नाटक कहकर इसका मज़ाक उड़ा रहा था.

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लेकिन संभव है कि जो छात्र और छात्राएं मोदी से रूबरू हुए वो इस कार्यक्रम को ज़िन्दगी भर न भूलें.

क्या हैं वो कारण जो मोदी के कार्यक्रम को नायाब बनाती हैं:

  • आरएसएस के पूर्व प्रचारक मोदी ने वो कर दिखाया जो आरएसएस सालों से स्कूलों और बच्चों से संपर्क साधकर करने की कोशिश कर रहा था.

  • इससे पहले किसी भी प्रधानमंत्री ने एक साथ देश भर के स्कूली छात्रों को संबोधित नहीं किया.

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  • मोदी ने लाइव प्रसारण से लाखों बच्चों तक अपना संदेश पहुँचाया और हो सकता है कई पर असर भी छोड़ा होगा.

  • मोदी ने ये भी सिद्ध कर दिया कि जनता से जुड़ने के लिए मीडिया की उन्हें ज़रूरत नहीं है.

  • इनमें से लाखों बच्चे अगले आम चुनाव में पहली बार वोट देंगे. इस दौरान अगर मोदी ने बड़ी खता न की तो वो इनकी पंसद भी हो सकते हैं.

  • उनका हाव-भाव दोस्ताना था. वो हंस भी रहे थे और मज़ाक भी कर रहे थे. अपने बचपन की शरारतें भी बच्चों से शेयर कर रहे थे.

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  • शिक्षक दिवस पर शिक्षकों की गिरती साख की बात करके और उन्हें नसीहत देकर उन्होंने एक 'महागुरु' बनने का प्रयास किया.

  • शिक्षकों का महत्त्व बढ़े या न बढ़े, मोदी की अहमियत आज के बाद यकीनन बढ़ सकती है.

आलोचना और विवादित भी

आज़ाद भारत के इतिहास में नरेंद्र मोदी का ये क़दम विवादों से भरा था.

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ये सही है कि दबे स्वर में सही, बहुत से शिक्षकों ने और राजनीतिक नेताओ ने इस कदम को पसंद नहीं किया.

कई शिक्षकों ने मोदी के विवादास्पद क़दम का विरोध किया है. उनका मानना है कि पांच सितंबर का दिन शिक्षकों के गौरव का दिन है जिसे प्रधानमंत्री हड़पना चाहते हैं.

उनके मुताबिक़ मोदी महागुरु नहीं हैं और उन्हें अपने कार्यक्रम को सुनने के लिए बच्चों को मजबूर नहीं करना चाहिए.

मोदी सरकार ने ये ज़रूर कहा था कि बच्चों और शिक्षकों के लिए प्रधानमंत्री का प्रसारण देखना अनिवार्य नहीं है.

लेकिन सरकारी दफ़्तरों से जिस तरह के लिखित आदेश भेजे गए थे और बाद में ग़ैर लिखित आदेश दिए गए, उससे महसूस हुआ कि इसमें शामिल न होना विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए समस्या पैदा कर सकता था.

बात यह है कि मोदी जो चाहते हैं वो हर कीमत पर करते हैं. इतना तय है कि जो भी हो देश में मोदी ‘टॉकिंग प्वाइंट’ बनने में मात नहीं खा रहे हैं.

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