कश्मीर में ज़वाहिरी की अपील का कितना असर?

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भारत प्रशासित कश्मीर के असंतुष्ट युवा क्या वाकई अल-क़ायदा की सुनेंगे और "जिहाद का झंडा उठाएंगे"? क्या वहां हिंसा की प्रवृत्ति है?

चरमपंथी संगठन अल क़ायदा ने इस साल की शुरुआत में 'जंग जारी रहनी चाहिए, कश्मीर के मुस्लिमों के लिए संदेश' नाम से वीडियो जारी किया था.

वीडियो में भारत प्रशासित कश्मीर के मुसलमानों से सीरिया और इराक़ के 'भाइयों' का अनुसरण करने और भारत के ख़िलाफ़ जिहाद छेड़ने का आग्रह किया गया था.

'अल क़ायदा: कट्टरपंथी इस्लाम की सच्ची कहानी' पुस्तक लिखने वाले पत्रकार जेसन ब्रुक के अनुसार 2013 में चरमपंथी गुट के नेता आयमन अल ज़वाहिरी ने कुछ 'रणनीतिक दिशानिर्देश' जारी किए थे, जिसमें कश्मीर का जिक्र था.

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जुलाई में चरमपंथी संगठन से जुड़े एक मौलवी ने एक वीडियो संदेश में 'वैश्विक जिहाद' में कथित कम भागीदारी के लिए भारतीय मुसलमानों को फटकार भी लगाई थी.

ज़वाहिरी के ताज़ा वीडियो में भारतीय उपमहाद्वीप में जिहादी संगठन बनाने का ऐलान किया गया है. वीडियो में असंतुष्ट मुस्लिम युवाओं, ख़ासकर कश्मीर में पहुंचने की बात कही गई है.

पढ़िए सौतिक विश्वास का पूरा विश्लेषण

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अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस के रणनीतिक और अंतरराष्ट्रीय मामलों के टिप्पणीकार प्रवीण स्वामी कहते हैं, "हमें इसे गंभीरता से लेना चाहिए. वे एक क्षेत्र को आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं. उनके पास कश्मीर में स्थानीय नेटवर्क है और हमें देखना होगा कि अब वो क्या करते हैं. गंभीर कार्रवाई की संभावना है."

भारत के एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य कश्मीर में अलगाववादियों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसा का लंबा इतिहास रहा है. कश्मीर में अब भी लाखों सैनिक तैनात हैं.

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वहां 1990 के दशक में हिंसा चरम पर थी और अब इसमें ख़ासी कमी आई है, लेकिन चरमपंथ की वजहों का समाधान अब भी नहीं ढूंढा जा सका है.

'राइज़िंग कश्मीर' अख़बार के वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुख़ारी कहते हैं, "आज कश्मीर के पढ़े-लिखे युवा भारत की मुख्यधारा से पूरी तरह विमुख हो गए हैं."

2010 में कश्मीर में भारत विरोधी प्रदर्शनों में 100 से अधिक लोगों के मारे जाने की यादें अब भी ताज़ा हैं.

दूसरी तरफ़ पाकिस्तान के साथ भारत के हाल के कूटनीतिक विवाद का मतलब कि शांति प्रक्रिया फिर अधर में लटक गई है.

कश्मीर पर असर नहीं

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कश्मीर में पर्यवेक्षकों का मानना है कि कश्मीर में तनावपूर्ण माहौल के बावजूद ज़वाहिरी की अपील का असर कुछ ही लोगों पर हो सकता है.

उनका कहना है पहले अल क़ायदा के लिए सीरिया, इराक़ और सोमालिया में आगे बढ़ने की राह आसान थी. भारत में तस्वीर एकदम अलग है. कश्मीर भी दुनिया के सबसे अधिक सैन्य उपस्थिति वाले क्षेत्रों में बना हुआ है.

राजनीतिक विश्लेषक नूर अहमद बाबा का कहना है कि भारत के साथ तमाम असंतोष और मतभेदों के बावजूद कश्मीरी और अधिक हिंसा और अल क़ायदा की कट्टरपंथी विचारधारा से नहीं जुड़ेंगे.

नहीं मिलेगा समर्थन

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प्रोफेसर बाबा कहते हैं, "भारत से असंतुष्ट युवा चरमपंथी संगठन का निशाना हो सकते हैं. कश्मीरियों में उन्हें उनके हक़ से वंचित रखने का भाव है और कश्मीरी अपने साथ भेदभाव महसूस करते हैं. कुछ लोगों में वहाबी और शुद्धतावादी विचारधारा भी देखने को मिल रही है. ऐसे व्यक्ति कट्टरपंथी संगठनों से प्रेरित हो सकते हैं. लेकिन अल-क़ायदा और उसके सहयोगियों को यहां समर्थन नहीं मिलेगा. याद रखें कि कश्मीरी चरमपंथी संगठन कुछ ही वर्षों तक आतंक फैला सकते हैं उसके बाद उन्हें सीमा पार पाकिस्तान का संगठन बनना पड़ेगा."

पत्रकार शुजात बुख़ारी भी उनसे सहमत हैं.

वे कहते हैं, "आप कश्मीर के आतंकवाद को समझेंगे तो पाएंगे कि वहां आतंकवाद लंबे समय तक नहीं चल सकता. 1990 के दशक में कश्मीर हिंसा के दौर में पहुंच गया था. और इसके कुछ ही समय बाद वे इससे तंग आ गए. आतंकवाद जब अपने चरम पर था तो स्थानीय गुटों ने इसका नेतृत्व विदेशी आतंकवादियों को दे दिया और स्थानीय चरमपंथियों की तादाद घटने लगी."

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बुख़ारी कहते हैं कि अल क़ायदा को यहां कोई समर्थन नहीं मिलेगा. उसे अपनी जड़ें जमाने के लिए जगह नहीं मिलेगी.

क्षेत्र के अलगाववादी भी निजी बातचीत में स्वीकार करते हैं कि कश्मीर में अल क़ायदा जैसे चरमपंथी संगठन के लिए कोई जगह नहीं है. उनकी 'सांप्रदायिक और हिंसा' की विचारधारा कश्मीर में न स्वीकार होगी न काम करेगी.

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