क्या हड़प्पा की लिपियाँ पढ़ी जा सकती हैं?

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हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई में मिले बर्तन समेत अन्य वस्तुओं पर सिंधु घाटी सभ्यता की अंकित चित्रलिपियों को पढ़ने की कोशिशें लगातार जारी हैं.

पुरातत्वविदों और भाषा के जानकारों की कोशिशों के बीच नागपुर के एक भाषाविद् का दावा है कि सैंधवी लिपि को गोंडी भाषा में प्रामाणिकता से पढ़ा जा सकता है.

यदि ये लिपियाँ पढ़ी जा सकेंगी तो भारतीय इतिहास का एक बड़ा हिस्सा सामने होगा.

संजीव चंदन की ख़ास रिपोर्ट

गोंडी भाषा के विद्वान आचार्य तिरु मोतीरावण कंगाली का दावा है कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सैंधवी लिपियाँ गोंडी में ज़्यादा सुगमता से पढ़ी जा सकती हैं.

सैंधवी लिपि को पढ़ने की कोशिश करने वाले डॉक्टर जॉन मार्शल सहित आधे दर्जन से अधिक भाषा और पुरातत्वविदों के हवाले से मोतीरावण कंगाली कहते हैं, "सिन्धु घाटी सभ्यता की भाषा द्रविड़ पूर्व (प्रोटो द्रविड़ीयन) भाषा थी."

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वहीं ग्रियर्सन सहित दूसरे भाषाविदों का ज़िक्र करते हुए वे गोंडी भाषा को उसके उच्चारण और पिक्टोग्राफ़ के आधार पर सभी द्रविड़ परिवार की भाषाओं की जननी बताते हैं.

इस दावे के साथ ही 2002 में उन्होंने सिंधवी लिपि को गोंडी भाषा में समझाने की कोशिश की और एक पुस्तक लिखी, 'सैंधवी लिपि का गोंडी भाषा में उद्वाचन.'

दावे के आधार

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हड़प्पन लिपि को दाएं से बाएं लिखा जाता है, जिसका सांस्कृतिक आधार गोंड समाज में मौजूद है. वे सारे कार्य दाएं से बाएं (एंटी क्लाॉक वाइज़) करते हैं.

जिस द्रविड़ भाषा में इन लिपियों को पढ़ने की कोशिश करते हुए पुरातत्वविद इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इन्हें द्रविड़ पूर्व भाषा में पढ़ा जा सकता है, उस द्रविड़ शब्द का उद्गम गोंडी भाषा के 'दईरबीर' शब्द से है.

द्रविड़ भाषा परिवार की तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम आदि में इन लिपियों को पढ़ने की कोशिशें सफल नहीं हुईं.

सिंधु घाटी-क्षेत्र से संलग्न पूर्व द्रविड़ परिवार के भील, मीना, गोंड समुदाय की बोलियों–भाषाओं में सैंधवी लिपियों को न पढ़कर दो हज़ार किलोमीटर दूर की द्रविड़ भाषा तमिल आदि में इन्हें पढ़ने की कोशिश तर्कसांगत नहीं है.

भील और मीना समुदाय की अपनी भाषाएँ नष्ट हो चुकी हैं, गोंडी आज भी जीवित है.

ऋग्वेद के अनुसार दुर्योण 'कुयव असुरों' की राजधानी थी, जिसे जला दिया गया था. मोहनजोदड़ो को भी जलाया गया था. यह आर्य पूर्व द्रविड़ियन की राजधानी बाताई जाती है. गोंड समुदाय के लोग आज भी धरती माता की पूजा पर 'कुयव' से संबंधित मंत्र का जाप करते हैं.

नगरों के निर्माता

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आज गोंड समुदाय के लोग महाराष्ट्र, आंध्र, उड़ीसा और छतीसगढ़ सहित कई राज्यों में रहते हैं.

गोंड महाराजाओं ने विदर्भ के नागपुर (1702 में बख्त बुलंद शाह ने), चंद्रपुर (भीम बल्लारशाह ने), मध्यप्रदेश के आधुनिक जबलपुर और तब गढ़-मंडला (संग्रामशाह ने) आदि अनेक शहरों को बसाया.

इस इलाके में लाखों की संख्या में गोंड समुदाय के लोग रहते हैं, जो गोंडवाना राज्य के दावेदार हैं.

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गोंडी साहित्य और संस्कृति को समर्पित कार्य करने बाले आरबीआई के पूर्व प्रबन्धक (नागपुर) और भाषाविद कंगाली ने अपने नाम से राम शब्द को हटाकर रावण जोड़ लिया.

वे इस फैसले को अपनी जड़ों से जुड़ना बताते हैं, "आज भी नागपुर सहित कई शहरों में रावण की पूजा होती है."

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