बाढ़ की कहानी, उन्हीं की जुबानी

  • 8 सितंबर 2014
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भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में बाढ़ से भारी विनाश के बीच अब तक करीब 175 लोगों की मौत हो चुकी है. जबकि लाखों की संख्या में लोग प्रभावित हुए हैं.

बाढ़ से हुआ विनाश तो अब साफ दिखाई दे रहा है. जम्मू के गुर्जर कॉलोनी में भी बाढ़ से भारी नुक़सान हुआ. जिन लोगों पर ये बाढ़ कहर बन कर गुजरी, सुनते हैं उनकी कहानी, उन्हीं की जुबानी.

शकील अहमद, सरकारी कर्मचारी

हम लोग रात में जग रहे थे कि पानी आया, इतना पानी था और इतना तेज़ कि जैसे गोली चल रही हो. मैं गाड़ी को ऊंची तरफ़ लगाने गया. जब वापस आया तो देखा कि घर में पानी घुस चुका है, लगभग पांच फुट ऊंचा पानी था. बच्चे उसमें फंसे हुए थे.

हमने किसी तरह उनको पानी में से बाहर निकाला. हमारे पास किसी तरह की कोई मदद नहीं है. मोहल्ले में किसी के पास कुछ भी नहीं है. सब लुट चुके हैं.

घरों में छह-सात फ़ुट मलबा और मिट्टी घुसी हुई है. मज़दूर उसे निकालने के दस-पंद्रह हज़ार रुपये मांग रहे हैं.

सोमवार को स्थानीय निकाय ने कुछ मज़दूर भेजे हैं जो राहत पहुंचा रहे हैं.

हो सकता है कि हमें बक़रीद घर के बाहर ही मनानी पड़े.

सईदा मलिक, गृहणी

हम घरों में कई दिन के बाद वापस आए हैं. हमारा सबकुछ बर्बाद हो चुका है. टीवी, फ्रिज, कुर्सियां, पलंग. बच्चों के कपड़े भी हमें फेंकने पड़े, वो रखने के क़ाबिल नहीं रह गए थे.

सुबह जब पानी आया, तब नमाज़ का वक़्त था, पानी इतनी तेज़ी से आया कि हम बच्चों को लेकर ऊपर की मंज़िल की तरफ़ भागे. हम जब छत पर थे तो पड़ोसियों ने दूसरी तरफ़ से सीढ़ी लगाई. तब जाकर हमनें दूसरों के घर पनाह ली.

हमारे और बच्चों के पांवों में चप्पलें तक नहीं थीं.

दिलावर अली, दुकानदार

वो तो शुक्र है अल्लाह का कि लोगों की जानें बच गईं. पानी का रेला बहुत तेज़ था. मेरी दुकान का सारा सामान बह गया.

बस यूं समझें कि एक दूसरे का दुख देख रहे हैं और साथ खड़े हैं.

मेरा घर भी पास ही है. एक अजीब सी हालत थी घर का सामान बचाने की कोशिश करता तो दुकान का माल बह रहा था, और दुकान का सामान बचा रहा था तो घर का.

मैंने इस तरह का सैलाब 36 साल के बाद देखा है. 1988 में यहां बड़ा सैलाब आया था. उसके बाद भी पानी आया, लेकिन ये बहुत बड़ा सैलाब था. इसने हमारे घरों की दीवारों को तोड़ डाला. खिड़कियां टूट गईं, शीशे बिखर गए.

हमारे बिस्तर, सोफ़े, फ्रिज सब नदी के बहाव में बह गए.

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