मोदी से क्यों ख़फ़ा हुए मज़दूर संगठन

  • 8 सितंबर 2014
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ख़ुद को नंबर वन मज़दूर बताने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तमाम मज़दूर संगठनों के निशाने पर आ गए हैं. यहां तक कि संघ और भाजपा की सहयोगी यूनियन ने भी उनके ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है.

मोदी के सत्ता संभालने के दो महीने के भीतर केंद्रीय कैबिनेट ने श्रम क़ानूनों में 54 संशोधन प्रस्तावित किए हैं.

इन संशोधनों को लाने की हड़बड़ी पर ट्रेड यूनियनें और वामपंथी संगठनों ने सवाल खड़े किए हैं. हालांकि सरकार ने इसे 'कारोबार के लिए माहौल' बनाने वाला क़दम बताया है.

पढ़ें संदीप राय की रिपोर्ट

सरकार बनने के दो महीने बाद ही, 30 जुलाई को मोदी कैबिनेट ने फ़ैक्ट्रीज़ एक्ट 1948, अप्रेंटिसेज़ एक्ट 1961 और लेबर लॉज़ एक्ट 1988 जैसे श्रम क़ानूनों में कुल 54 संशोधन पास किए.

लेबर हिस्टोरियन और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर प्रभु महापात्रा कहते हैं, ''यदि ये बिल पास होते हैं तो ‘हायर एंड फॉयर’ की नीति क़ानूनी हो जाएगी और महिलाओं से नाइट शिफ्ट में भी काम लिया जा सकेगा.''

अप्रेंटिसेज़ संशोधन बिल 2014 के अनुसार, कारखानों में अधिक से अधिक प्रशिक्षु श्रमिक रखे जा सकेंगे जिन्हें न्यूनतम वेतन से 30 प्रतिशत कम वेतन मिलेगा और तमाम श्रम क़ानूनों के दायरे में वे नहीं आएंगे.

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हालांकि, सरकार का तर्क है कि इससे ग़ैर इंजीनियरिंग क्षेत्र के स्नातकों और डिप्लोमा होल्डरों के लिए उद्योगों में नौकरी की संभावनाएं खुल जाएंगी.

फ़ैक्ट्रीज़ और अप्रेंटिसेज़ संशोधन बिल 2014 को सात अगस्त को संसद में पेश किया गया था और अप्रेंटिसेज़ संशोधन बिल लोकसभा से पारित भी हो चुका है.

आइए, देखते हैं क्या हैं ये संशोधन.

फ़ैक्टरीज़ संशोधन बिल 2014

1- फ़ैक्ट्रीज़ संशोधन बिल फ़ैक्ट्रियों में कर्मचारियों की संख्या को बढ़ाने का पूरा अधिकार राज्यों को दिया गया है. इससे पहले यह अधिकार केंद्र के पास था.

2- काम के घंटे को नौ से बढ़ाकर 12 घंटे कर दिया गया है. पहले काम की अवधि आठ घंटे थी और एक घंटा का ब्रेक था. अब कंपनियां 12 घंटे में सुविधानुसार आठ घंटे काम ले सकेंगी.

3- ओवरटाइम को बढ़ा कर प्रति तिमाही 100 घंटे कर दिया गया है. कुछ मामलों में इसे 125 घंटे तक बढ़ा दिया गया है. पहले यह अधिकतम 50 घंटे था.

4- औद्योगिक विवाद मामले में केस दर्ज करने का अधिकार राज्य सरकार को दे दिया गया है. पहले यह अधिकार लेबर इंस्पेक्टर के पास था.

अप्रेंटिसेज़ संशोधन बिल 2014

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1- कंपनियां पहले की अपेक्षा अधिक से अधिक प्रशिक्षु कर्मचारी रख सकेंगी. पहले वे कुछ निश्चित प्रतिशत में ही प्रशिक्षु कर्मचारी रख सकती थीं.

2- प्रशिक्षण कार्यक्रमों को पूरी तरह आउटसोर्स करने की अनुमति दी गई है. पहले यह फ़ैक्ट्री की ज़िम्मेदारी थी.

3- प्रशिक्षु रखने के लिए पांच सौ नए ट्रेड को खोल दिए गए हैं.

4- प्रशिक्षु कर्मचारियों को दिए जाने वाले स्टाइपेंड का पचास प्रतिशत हिस्सा सरकार देगी, जबकि पहले पूरी ज़िम्मेदारी फ़ैक्ट्री की थी.

राजस्थान ने दिखाई राह

राजस्थान सरकार ने इंडस्ट्रियल डिसप्यूट एक्ट 1947, फ़ैक्ट्रीज़ एक्ट 1948, कांट्रैक्ट लेबर (रेग्युलेशन एंड एबोलिशन) एक्ट 1970 और अप्रेंटिसेज़ एक्ट 1961 में संशोधन कर मोदी सरकार को राह दिखाई.

अब राजस्थान में अधिकतम तीन सौ श्रमिकों वाली कंपनियों में छंटनी और तालाबंदी के लिए सरकार की इजाज़त नहीं लेनी पड़ेगी. पहले यह संख्या सौ थी.

यूनियन बनाने के लिए 15 फ़ीसदी श्रमिकों का प्रतनिधित्व आवश्यक था जिसे अब 30 फ़ीसदी कर दिया गया है और पचास से कम कर्मचारी संख्या वाली कंपनियों को कांट्रैक्ट लेबर एक्ट से छूट दी गई है.

हड़बड़ी पर सवाल

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इन संशोधनों पर बहुत चर्चा नहीं हो पाई क्योंकि शिकायत-सुझाव के लिए महज 18 दिनों में 15-15 दिन के अंतर पर केंद्रीय श्रम मंत्रालय ने नोटिस जारी जारी किए थे.

यहां तक कि पूर्व श्रम मंत्री और लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को भी संसद में कहना पड़ा, ''क्या संशोधन किए गए हैं, कोई नहीं जानता.''

हालांकि तमाम ट्रेडयूनियन संगठनों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है.

सेंटर ऑफ़ इंडियन ट्रेड यूनियन्स (सीटू) के महासचिव तपन सेन कहते हैं, ''सरकार का इरादा अब ठेका मजदूरी को भी ख़त्म कर, उससे भी सस्ते अप्रेंटिस मज़दूर रखने के लिए उद्योगों को छूट देने की है.''

संघ से जुड़े भारतीय मज़दूर संघ (बीएमएस) के उपाध्यक्ष वृजेश उपाध्याय ने कहा, ''पूर्व की सरकारों की नीति को ही मोदी सरकार ने आगे बढ़ाया है और हम इसकी हर तरह से मुख़ालफ़त करेंगे.''

लेकिन श्रम मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने इसे व्यावसायिक गतिविधियों को आसान बनाने वाला बताया है.

सवाल ये है कि श्रम कानूनों में जिन संशोधनों को सरकार हड़बड़ी में लागू कराना चाहती है, वो तो नब्बे के दशक से ही देश के तमाम उद्योगों-कारखानों में आम बात बन चुकी है.

फ़िर फ़र्क क्या पड़ेगा. तपन सेन कहते हैं, ''कंपनियां श्रम क़ानूनों के साथ जो कर रही हैं वो अभी तक ग़ैर क़ानूनी था, लेकिन आने वाले समय में यह सब क़ानूनी हो जाएगा.''

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