ड्राइवर की मौत की सज़ा बरक़रार

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बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे के एक ड्राइवर संतोष माने की मौत की सज़ा को बरकरार रखा है. ड्राइवर माने को वर्ष 2012 में नौ लोगों को कुचलकर मारने के अपराध में ये सज़ा सुनाई गई थी.

माने के वकील ने अदालत में उनके मानसिक रोग से पीड़ित होने की दलील दी थी, जिसे कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया था.

माने के वकील धनंजय माने और जयदीप माने की ओर से दायर की गई याचिका पर मंगलवार को बॉम्बे हाईकोर्ट में सुनवाई हुई. जस्टिस वीएम कानडे और जस्टिस पीडी कोडे की खंडपीठ ने वकीलों की इस दलील को नकार दिया कि संतोष माने मानसिक रोगी था. लेकिन माने उच्चतम न्यायालय का दरवाज़ा खटखटा सकते हैं.

आरोप

माने राज्य परिवहन मंडल में बस ड्राइवर के तौर पर काम करते थे. उन पर आरोप है कि 25 जनवरी 2012 की सुबह करीब आठ बजे पुणे स्थित स्वारगेट डिपो से माने ने एक बस निकाली और शहर के रास्तों पर पागलों की तरह उसे दौड़ाया.

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Image caption माने के परिवार ने उनके मानसिक रोगी होने की दलील दी है.

माने ने ये बस लगभग 25 किलोमीटर तक दौड़ाई और नौ लोगों को रौंद दिया. इस घटना में 39 लोग घायल हो गए साथ ही 25 से 30 वाहनों को नुकसान हुआ.

पुलिस को माने को रोकने के लिए फायरिंग करनी पड़ी थी.

माने मूल रूप से शोलापुर ज़िले से हैं. इस घटना के बाद परिवार वालों ने ये दावा किया था कि उन पर काला जादू किया गया था. उधर माने ने अदालत से कहा था कि उन्हें इस घटना के बारे में कुछ याद नहीं है.

इस वर्ष अप्रैल में ज़िला न्यायालय ने उन्हें फांसी की सज़ा सुनाई थी. पिछले महीने बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी उन्हें दोषी पाया था लेकिन उनकी सज़ा पर फ़ैसला नहीं सुनाया था.

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