सनातन धर्म के विरोधी थे नाथ पंथी

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उत्तर प्रदेश में लखनऊ जिला प्रशासन की इजाजत के बगैर योगी आदित्यनाथ ने रैली करके ये साफ कर दिया है कि राज्य की राजनीति टकराव के एक नए दौर की ओर रुख कर रही है.

अभी कुछ ही दिनों में होने जा रहे कई विधानसभा और एक लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव में राज्य में भाजपा का रथ तीन सारथी मिलकर हांकेंगे.

लक्ष्मीकांत वाजपेयी जो भाजपा के राज्य अध्यक्ष हैं, मूलतः पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा का प्रभाव गहन करेंगे. कलराज मिश्र मध्य उत्तर प्रदेश में और महंत आदित्यनाथ पूर्वी उत्तर प्रदेश में.

इनमें दो ब्राह्मण हैं और एक जाति से ठाकुर. आदित्यनाथ उस नाथ पंथ के महंत हैं जो अपने मूल से ही सनातनी हिंदू पंथ का विरोधी रहा है.

इसका प्रभाव पिछड़ी और दलित जातियों में अधिक है लेकिन अब इसके मुखिया ही सनातनी धर्म के ध्वजवाहक भारतीय जनता पार्टी की चुनावी नैया के सारथी बन गए हैं.

पढ़ें बद्री नारायण का विश्लेषण

आदित्यनाथ के जातीय व्यक्तित्व से ज़्यादा धार्मिक व्यक्तित्व प्रभावी है. कई साम्प्रदायिक दंगों में इनका नाम जुड़ता रहा है.

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महंत आदित्यनाथ मात्र पूर्वी उत्तर प्रदेश के ठाकुरों में ही प्रभावी नही हैं, वे इस क्षेत्र में हिंदूत्व के सबसे प्रभावी आदर्श हैं.

साथ ही राजा भैया जैसे ठाकुर माफिया के पक्ष में वे खुलकर बोलते रहे हैं. उनकी हिंदू युवा वाहिनी को राजा भैया की अनेक गिरफ्तारियों के वक्त नारा लगाते, प्रदर्शन करते देखा गया है.

हिंदू युवा वाहिनी बनाकर और अपनी लगातार सक्रियता से वे हिंदूत्व का राजनीतिक बाज़ार सदा गर्म रखते हैं.

नाथ पंथ

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योगी आदित्यनाथ 'नाथ पंथ' के महंत हैं. नाथ पंथ हिंदू सनातन पंथ का विरोधी रहा है, इसके संस्थापक गोरखनाथ जी ने सदा ब्राह्मण पंथों, वैष्णव सनातन पंथों, जिसका नेतृत्व भाजपा करता रहा है, के विरोधी रहे हैं.

लेकिन आज नाथ पंथ के सबसे बड़े मठ गोरखनाथ का महंत भाजपा के हिंदूत्व की राजनीति का प्रमुख प्रचारक बन कर उभरा है. नाथ पंथ अपने मूल सांस्कृतिक व्यवहार में सनातन संस्कृति से कई मामलों में एकदम विपरीत है.

सनातन पंथ में दलितों की संख्या कम है, नाथ पंथ में उपेक्षित दलित और पिछड़ों की संख्या ज़्यादा है.

नाथ पंथ का प्रभाव मूलतः छोटी दलित जातियों जैसे जोगी, कोल, संपेरा, सरवन, बुनकर, रंगरेज इत्यादि जातियों में रहा है. आज भी अनेक छोटी दलित जातियां नाथपंथ से जुड़ी हैं.

इन दलित समूहों का धार्मिक केन्द्र गोरखपुर का गोरखनाथ धाम है, जिसके महंत आदित्यनाथ जी रहे हैं. नाथ पंथ में आज भी जोगियों का एक बड़ा तंत्र है जो गांव-गांव घूमकर सारंगी बजाकर अलख लगाते हैं.

पूर्वी यूपी में असर

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हालांकि ये पूरी तरह गैर राजनीतिक समूह होते हैं किन्तु जब धर्म राजनीति का अंग बनने लगे तो इनके राजनीतिक इस्तेमाल की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है.

आदित्यनाथ यूं भी उग्र हिंदूत्व के प्रवक्ता होने के कारण आक्रामक हिंदू युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं.

इस प्रकार आदित्यनाथ नाथ पंथ के धार्मिक प्रभाव, दलित समूहों से जुड़ाव, जोगियों की प्रचारात्मक शक्ति, हिंदू युवाओं के बीच अपने सघन प्रभाव, ठाकुर जाति में जातीय आधार होने के कारण पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा के लिए महत्वपूर्ण आधार हो सकते हैं.

शाह की योजना

आदित्यनाथ के इन्हीं महत्वों को समझते हुए लोकसभा चुनाव के पहले जब उत्तर प्रदेश की कमान अमित शाह को सौंपी गई तो वे अयोध्या के बाद गोरखपुर आए.

और आदित्यनाथ के गुरु महंत अवैद्य नाथ जो राम जन्म भूमि आन्दोलन के वक्त भाजपा की राजनीति के प्रमुख स्तम्भ बनकर उभरे थे, के चरणों में घंटों बैठे रहे.

उन्होंने गोरखनाथ का आर्शीवाद लिया और आदित्यनाथ से लम्बी मंत्रणा की. आदित्यनाथ को पहली बार भाजपा की राज्य की राजनीति में अगुवाई का मौका दिया गया है.

यह भूमिका अमित शाह की सुविचारित रणनीति का एक सच है, जो धर्म, विकास और राजनीति को जोड़कर चलने की है.

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