ये तबाही तो होनी ही थी: सुनीता नारायण

  • 10 सितंबर 2014
सुनीता नारायन

जम्मू-कश्मीर में आई भीषण बाढ़ से विस्थापित होने वालों की संख्या दसियों हज़ार हो चुकी है.

वहीं पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार हो रही प्राकृतिक आपदाओं के पीछे पर्यावरण संबंधी दूरदर्शिता की कमी को दोष दे रहे हैं.

पर्यावरण मामलों की शीर्ष संस्थाओं में गिने जाने वाले सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरनमेंट की प्रमुख सुनीता नारायण का कहना है कि उत्तराखंड त्रासदी से एक भी सबक नहीं लिया गया.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "उत्तराखंड पर सबने कहा कि ये मानव-निर्मित त्रासदी थी लेकिन लोग उसके कुछ वर्ष पहले लेह में हुई तबाही भूल गए."

'अनदेखी'

सुनीता नारायण के अनुसार दुनिया भर में हो रहे जलवायु परिवर्तन के चलते भारत में कुछ जगहों पर कम समय में अत्यधिक बारिश होने की चिंता हमेशा से ही रही है लेकिन सरकारों और लोगों ने इस पर ख़ास ध्यान नहीं दिया है.

उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया है कि जम्मू-कश्मीर में हर झील एक दूसरे से जुड़ी हुई है जिससे पानी का संतुलन बना रहे.

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उनके मुताबिक़ बाढ़ से तबाही तो होनी ही थी क्योंकि पिछले कुछ दशकों में ऐसे इलाकों में रिहायश बढ़ी जो पानी के करीब थे और वहां कभी भी निर्माण कार्य नहीं होना चाहिए था.

सुनीता का मत है कि सरकारों को बैठ कर एक ऐसा ढांचा तैयार करने की आवश्यकता है जिसमें ये तय हो कि भारत के किन इलाकों में निर्माण कार्य बिलकुल नहीं होना चाहिए.

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