'वीआईपी निकाले गए, बाक़ी को क्यों छोड़ा?'

कश्मीर बाढ़

भारत प्रशासित कश्मीर में बाढ़ की त्रासदी से जनजीवन बेहद प्रभावित हुआ है.

सेना की अथक कोशिशों के बावजूद एक बड़ी आबादी है जो अपने परिजनों की मदद के लिए गुहार लगा रही है.

किसी तरह सुरक्षित बच गए लोगों का दर्द उनकी ज़बान पर है.

जम्मू से फ़ैसल मोहम्मद अली की रिपोर्ट

मंगलवार को जम्मू के डिविज़नल कमिश्नर के दफ़्तर में सरकारी कर्मचारियों, परेशान माता-पिता, बहन-भाई, बच्चों को साथ लिए गृहणियां और व्यापारियों का पचास से साठ लोगों का एक दल जमा था.

वो मांग कर रहे थे कि सैलाब में फंसे उनके अपनों को निकालकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की व्यवस्था की जाए.

वसंती पंडित कहती हैं कि उनके बूढ़े सास-ससुर श्रीनगर में फंसे हैं और उनके पास कोई मदद नहीं पहुंची है.

उनके साथ खड़ी एक महिला कहती हैं, "जब वीआईपी वहां से निकाले गए हैं तो वो फिर हमारे लोगों को क्यों नहीं निकाल सकते हैं!"

साफ़ पानी की क़िल्लत

दूसरी तरफ़ अनंतनाग से मीनू पटिगारू ने कहा कि उनके और पास पड़ोस के घरों में पानी घुस गया और तक़रीबन एक हज़ार लोग बुरी हालत में कई दिनों से वहां फंसे हैं, लेकिन उनके पास कोई मदद नहीं पहुंची है.

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अनंतनाग कश्मीर घाटी के दक्षिणी क्षेत्र में पड़ता है जो इस बाढ़ से सबसे बुरी तरह प्रभावित हुआ है.

राजौरी में सेना का कैंप

बीबीसी टीम जब भारत-पाक सीमा पर स्थित राजौरी क्षेत्र में गई तो सेना ने वहां चिकित्सा कैंप लगा रखा था, जिसमें पास-पड़ोस के बाढ़ ग्रसित शहरियों का चेक अप सेना की मेडिकल टीम कर रही थी.

वो लोगों को दवाएं भी मुहैया करवा रहे थे. बाढ़ की वजह से ये इलाक़ा दूसरे क्षेत्रों से पूरी तरह कटा हुआ है और बीबीसी टीम को वहां जाने के लिए सेना की मदद लेनी पड़ी थी.

वहां मौजूद मोहम्मद आरिफ़ ने कहा कि प्रशासन तो पूरी तरह से सोया पड़ा है और उन्हें जो भी मदद मिल रही है फ़ौज से मिल रही है.

लेकिन लाड़ गांव की रेश्मा, जो कि कैंप में आईं थी, कहने लगीं कि उनकी ज़मीन, परिवार सब बह गया है और उन्हें कोई मदद नहीं मिली है.

सेना के प्रवक्ता कर्नल मनीष मेहता ने बीबीसी को बताया कि सेना ने अबतक 65,000 से 70,000 आपदा में फंसे लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया है.

राजधानी में भी मदद नहीं

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एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि सेना ने दो तरह से बचाव और राहत कार्यों को किया है.

कई बार उन्हें फंसे लोगों की जानकारी प्रशासन से मिली है और कुछ बार वो इसका फ़ैसला खुद करते हैं.

श्रीनगर के एयरपोर्ट रोड के निवासी निसार अहमद कहते हैं कि सेना को लेकर कश्मीर घाटी के लोगों के दिल में भरोसा नहीं है.

उनका भी दावा है कि राजधानी में रहने के बावजूद उनकी मदद को कोई नहीं आया.

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