बाढ़ साथ लाई है मुश्किलों का अंबार

  • 11 सितंबर 2014
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कश्मीर घाटी में बाढ़ के बाद राहत बचाव कार्य जारी है. लेकिन अब भी बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हैं और कई लोगों को अपनों का पता नहीं चल रहा.

बीबीसी संवाददाता फैसल मोहम्मद अली भी श्रीनगर पहुंचे हैं. उनकी डायरी

जैसे ही एयरपोर्ट से बाहर निकला तो सामने ही सैकड़ों लोगों की भीड़ वहां बने पार्कों, बंद दुकानों के सामने के बरामदों और बड़े मैदान में बैठी दिखी.

दस, बीस और पचास के झुंड में, पोटलियों, थैलों और किस्म-किस्म के बैगों के पास बैठे मज़दूर बिहार, उत्तर प्रदेश या भारत के दूसरे हिस्सों से घाटी में आकर काम कर रहे थे.

बिहार के अररिया ज़िले के मोहम्मद अज़ीम के मुताबिक़ उन्हें पता चला कि एयरपोर्ट से फ्री विमान सेवा जा रही है बाढ़ में फंसे लोगों को लेकर तो कुछ लोग किसी न किसी तरह यहां पहुंच गए.

बाक़ी को सेना या राहतकर्मी यहां लाए और अब वे पिछले कई दिनों से यहां फंसे हैं. न तो उनके पास खाने का कोई जुगाड़ है और न ही सिर पर छत.

एयरपोर्ट से शहर जाने वाली मुख्य सड़क पर अब भी चार से पांच फुट तक पानी जमा है. लोग ट्रैक्टर, टप्परों वग़ैरह में बैठकर राहत सामग्री लेकर अंदर के इलाक़ों में जा रहे हैं.

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इसी रास्ते से एक होटल तक जाने की कोशिश में हमारी गाड़ी में पानी घुसने की हालत बन गई.

मुश्किलों का अंबार

शहर के सारे होटल, यहां तक कि मशहूर ब्रॉडवे होटल भी पानी में डूबे हुए हैं और ठहरने के लिए कमरा ढूंढ़ पाना कुछ उस तरह का ही मुश्किल काम है जैसे अल्लाह मियां को तलाश कर पाना.

बहुत मशक्कत के बाद हमें शहर के बाहरी इलाक़े में किसी स्थानीय दोस्त की पैरवी से जब होटल में कमरा मिला तो रिसेप्शन पर बैठे आदमी ने साफ कह दिया कि पीने के पानी का इंतज़ाम आपको ख़ुद ही करना पड़ेगा.

खाने-पीने के चीज़ों की कमी हो रही है और दूध भी नायाब सी चीज़ लग रही है. चाय पीने की बात तो भूल ही जाइए.

शहर को सूबे के दूसरे क्षेत्रों से जोड़ने वाले हाइवे को बाढ़ से बुरी तरह से नुक़सान पहुंचा है तो ज़ाहिर है शहर में सामान नहीं पहुंच पा रहा है और जो पहले से जमा था वो तेज़ी से ख़त्म हो रहा है.

शहर के कुछ पेट्रोल स्टेशन जो डूबे नहीं वे महज़ नाम को खुले हुए हैं.

हालांकि रविवार से बारिश नहीं हुई है और झेलम का पानी घट रहा है लेकिन डल झील में पानी का स्तर बढ़ रहा है तो ये ख़तरा है कि कहीं शहर के कुछ क्षेत्रों में पानी बढ़कर न घुसने लगे.

इन सबके बीच बहुत लोगों के अपनों का कोई अता पता नहीं और वे मोबाइल कनेक्टिविटी के बेहतर होने की उम्मीद में बैठे हैं कि हो सकता है तब वो फ़ोन आ जाए जिसका उन्हें बेसब्री से इंतज़ार है.

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