'अंधेरे में' : ...एक विराट स्वप्न फैंटेसी

गजानन माधव मुक्तिबोध, हिन्दी कवि, लेखक, आलोचक इमेज कॉपीरइट ramesh muktibodh
Image caption मुक्तिबोध की चर्चित कविता का अंतिम रूप 1964 में प्रकाशित हुआ था.

यह सिर्फ मुक्तिबोध के निधन की ही अर्धशती ही नहीं, उनके पहले काव्य-संग्रह 'चांद का मुँह टेढ़ा है' के प्रकाशन और हिन्दी ही नहीं बल्कि भारतीय साहित्य की अद्वितीय कविता 'अंधेरे में' के रचे जाने की भी अर्धशती है.

मुक्तिबोध का मन-मस्तिष्क एक लगातार जिरह करता, संवाद करता मन-मस्तिष्क है.

उनकी कविता, कहानी, साहित्यिक की डायरी, यहाँ तक कि उनका लघु-उपन्यास 'विपात्र' भी, इसके प्रमाण हो सकते हैं कि उसमें निरंतर संवाद की शैली हमें दिखाई देती है.

'अंधेरे में' मुक्तिबोध की सृजनात्मकता का सबसे उन्नत शिखर है.

पढ़िए, राजेश जोशी का लेख विस्तार से

'अंधेरे में' केवल स्वाधीनता के बाद के समय या नेहरू-युग की ही आलोचना नहीं है, वह जैसी जनतांत्रिक संरचना हमने रची है या प्राप्त की है उसके मूल अंतर्विरोधों और ख़तरों का एक आख्यान भी है.

यह कविता आशंकाओं और जनाकांक्षाओं, स्वप्नों और संभावनाओं से बुनी गई एक विराट स्वप्न फैंटेसी है.

'अंधेरे में' को मात्र कवि की खोई हुई परम अभिव्यक्ति की खोज आख्यान नहीं माना जाना चाहिए.

वह व्यक्ति और एक पूरे समाज की खोई हुई परम अभिव्यक्ति, जो वस्तुतः एक-दूसरे से अभिन्न है और एक के बिना दूसरे को पाया ही नहीं जा सकता, को पाने और उसके रास्ते में आने वाले व्यवधानों और संघर्षों का महा-आख्यान भी है.

धुंधले और धूसर रंग

मुक्तिबोध ने 'एक साहित्यिक की डायरी' में 'एक लंबी कविता का अंत' शीर्षक के अंतर्गत लिखा है,

"ऐसी स्थिति में जबकि समाज में संजीवनकारी उत्प्रेरक आंदोलन या ऐसी संगठित शक्ति नहीं है, एक संवेदनशील मन जिसमें अब तक अवसरवादी कौशल और लाभ-लोभ की समझदारी विकसित नहीं हुई है, केवल अपने को निस्सहाय महसूस करता है."

वह लिखते हैं, "यदि वो कवि होता है तो सहज मानवीय आकांक्षाओं के सामाजिक वातावरण के अभाव में उसके काव्यात्मक रंग अधिक श्यामल, अधिक बोझिल और अभावग्रस्त हो जाते हैं."

यह डायरी 1963 की है यानी 'अंधेरे में' के रचनाकाल के लगभग आसपास की.

यह वह समय और सामाजिक वातावरण था जिसने मुक्तिबोध की कविता को गहरे अंधेरे, धुंधले और धूसर रंग दिए.

औपनिवेशिक बंटवारा

इस कविता में एक जगह आता है कि 'यह सिविल लाइंस और मैं अपने कमरे में यहाँ पड़ा हूँ.'

सिविल लाइंस औपनिवेशिक काल का वह इलाक़ा है जिसे अंग्रेज़ शासकों ने अपने और उच्च मध्य वर्ग के लिए बनाकर हर शहर को लगभग दो अलग-अलग हिस्से में बांट दिया था.

सिविल लाइंस का ज़िक़्र एक संकेत की तरह लगता है. मुझे लगता है कि 'अंधेरे में' में उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श का एक महाकाव्य है.

मुक्तिबोध जो कुछ कहना चाहते थे, उनके मन की पीड़ा, उनके जो निष्कर्ष हैं वो सारे के सारे 'अंधेरे में' कविता में दिखाई देते हैं.

(रंगनाथ सिंह से बातचीत पर आधारित)

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