दम तोड़ते पेशेः न खरीदार, न कारीगर

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लोग कहते हैं कि समय बदल रहा है लेकिन वक्त के साथ बदल रही चीजों का जिक्र बहुत कम होता है.

कई चीजें गुमशुदा हो रही हैं. किस्से कहानियों का हिस्सा बन कर रह गई हैं.

जिन पेशों के सहारे लोग कभी रोज़ी रोटी चलाया करते थे, अब न उनके खरीददार बचे हैं और न पहले जैसे कारीगर.

बाजार के अपने तौर तरीके हैं, यहां वहीं बच रहा है जो बदली हुई जरूरतों के हिसाब से खुद को ढाल रहा है.

'दम तोड़ते पेशों' पर बीबीसी हिंदी की सिरीज की दूसरी कड़ी

छत्तीसगढ़ से स्थानीय पत्रकार आलोक प्रकाश पुतुल ने टिन के बक्से और लकड़ी की खिलौना गाड़ी बनाने वाले और कान की सफाई करने वालों का हाल जानने की कोशिश की है.

टिन वाले बक्से

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आज के ज़माने की तरह ब्रांडेड कंपनियों वाले सूटकेस, ब्रीफ़केस पहले नहीं होते थे.

पहले लोहे की चादरों के बक्सों का चलन था. ससुराल जाने वाली दुल्हन सुंदर नक्काशीदार बक्से लेकर जाती थी.

स्कूल जाने वाले बच्चे भी ऐसे ही बक्से लेकर स्कूल जाते थे. बदलते वक्त में अब इनका कोई खरीदार नहीं बचा.

छोटे-बड़े कस्बों में थोड़े लोग बचे हैं, जो अब ऑर्डर पर टिन के छोटे-बड़े बक्से बनाते हैं.

खिलौना गाड़ी

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बिहार, उत्तरप्रदेश और मध्यभारत के इलाकों में छोटे बच्चों का पहला खिलौना लकड़ी से बनी तीन चक्कों वाली गाड़ी ही हुआ करती थी.

तब वॉकर का चलन छोटे शहरों-कस्बों में नहीं था और इन्हीं गाड़ियों के सहारे बच्चे चलना भी सीखते थे.

लकड़ी की बैलगाड़ी का चलन मध्यभारत में खूब था. इन्हें बनाने और बेचने वाले बढ़ई अब थोड़े से रह गये हैं. और खरीदने वाले भी कहां बचे हैं!

कान की सफाई

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कान की सफ़ाई एक कला होती थी और यह काम करने वाले खास हुनरमंद.

छोटे से थैले में रुई के फाहे, अपने ही कान पर पीतल की तीली और जरुरी हुआ तो थोड़ा-सा तेल.

इन्हीं सब से होती थी कान की सफाई. अपने ग्राहक को खास अदा के साथ पहले कान देखने और बाद में फिर कान की सफ़ाई की सलाह देने वाले ऐसे लोग अब कम ही बचे हैं.

झटपट फ़ोटो

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कानपुर में मौजूद स्थानीय पत्रकार रोहित घोष बताते हैं कि आज से बीस साल पहले अगर किसी को पासपोर्ट फ़ोटो की तुरंत ज़रुरत होती थी तो वह कचहरी पहुँच जाता था.

वहां उसे कई फ़ोटोग्राफर मिल जाते थे जो ट्राईपॉड के ऊपर रखे डब्बानुमा कैमरे के साथ खड़े रहते थे. फ़ोटोग्राफर ग्राहक को भांप लेते थे.

ग्राहक को कैमरे के सामने बिठाते थे और अपना सिर कैमरे के पीछे लगे काले कपडे में डाल देते थे फ़ोटो खींचने के लिए.

फ़ोटो खींचने के चंद पलों में फ़ोटो को डेवलप कर दिया जाता था. प्रक्रिया तेज़ थी, इसलिए ऐसे तस्वीरों को झटपट फ़ोटो भी कहा जाता था.

समय बदला. पोलराइड कैमरे आए. समय ने फिर करवट ली. पोलराइड भी अब बनने बंद हो गए हैं. अब डिजिटल कैमरों का ज़माना है.

कुछ फ़ोटोग्राफर अपनी दुकान के सामने अपना पुराना डब्बा नुमा कैमरा आज भी रखते हैं लेकिन साइन बोर्ड के तौर पर.

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