भारतीय अर्थव्यवस्था के ‘अच्छे दिन अभी दूर’

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भारत में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पूर्ण बहुमत वाली केंद्र सरकार बनने के बाद देश में ही नहीं बल्कि विश्व भर में एक उम्मीद की लहर दौड़ती दिखाई दे रही है.

लोग आस लगाए हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में पिछले कई वर्षों से लगातार बढ़ती महंगाई और दयनीय आर्थिक स्थिति को जल्दी ही दुरुस्त करने के लिए ठोस कदम उठाएंगे.

विदेशी निवेशक, जो पिछली केंद्र सरकार के एक दशक लंबे शासन के अंतिम दिनों तक भी अपूर्ण रह गई अनगिनत परियोजनाओं और व्यापक होते भ्रष्टाचार की वजह से निराश बैठे थे, अब उत्साहित हैं कि भारत के औद्योगिक विकास में तेज़ी आएगी.

निश्चित रूप से केंद्र सरकार में इतने लंबे अरसे के बाद एक बड़ा बदलाव होने से यह उत्साह स्वाभाविक है, लेकिन क्या सिर्फ़ प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल बदल जाने से भारतीय अर्थव्यवस्था की मूल कमज़ोरियाँ और अक्षमताएँ इतनी जल्दी दूर की जा सकती हैं?

भारतीय अर्थव्यवस्था की असलियत और संभावित बाधाओं पर एक रिपोर्ट

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विश्व बैंक जैसे कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने आगाह किया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था नाज़ुक मोड़ पर खड़ी है और आने वाले वर्षों में इस नई सरकार को अत्यधिक सतर्क और विषम परिस्थितियों के लिए तैयार रहना होगा. देखिए, आँकड़े क्या कहते हैं:

भारत बनाम चीन

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की हाल ही की रिपोर्ट दर्शाती है कि राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था आँकने के कई मापदंडों में भारत गंभीर रूप से पिछड़ा हुआ है.

रिपोर्ट यहाँ तक कहती है कि भारत की अर्थव्यवस्था आपातकालीन दौर से गुज़र रही है. इस रिपोर्ट ने 144 देशों की आर्थिक स्थिति और भविष्य में उनकी विकास दरों की संभावनाओं को आँका है.

भारत इन देशों में 71वें स्थान पर है, जो इसी रिपोर्ट के पिछले संस्करण से 11 स्थान नीचे चला गया है.

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यही नहीं, पिछले 6 वर्षों से भारत लगातार इन मापदंडों में फिसलता जा रहा है.

एशिया के दो सबसे विकासशील देशों– चीन और भारत के आर्थिक विकास को अक्सर एक स्पर्धा की तरह देखा जाता है.

2007 में भारत चीन से सिर्फ़ 14 स्थान पीछे था और अब यह फासला 43 स्थानों का हो गया है. दो दशक पहले भारत का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद चीन से अधिक था, लेकिन अब चीन भारत से चार गुना अधिक धनी देश है. कौन से कारण हैं जो भारत को लगातार पीछे धकेल रहे हैं?

अच्छी विकास दर ज़रूरी

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अनुसार एक देश की अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक एक अच्छी विकास दर बनाए रखने के लिए तीन चरणों से गुज़रना पड़ता है.

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पहला, मूल आधारिक संरचना, यानी स्वास्थ्य और शिक्षा की मूलभूत सुविधाएं. इनके साथ ही वृहत आर्थिक स्थिति – महंगाई, राजकोषीय घाटा और आयात-निर्यात तंत्र, आदि को भी सुदृढ़ रहना चाहिए.

इन दोनों मापदंडों में भारत की स्थिति दयनीय है. इसको बदलने के लिए सरकारी व निजी संगठनों की सक्रियता, आपसी तालमेल और नौकरशाही तंत्र का सक्रिय होना आवश्यक है.

इस बुनियादी संरचना के कमज़ोर होने से कोई भी अर्थव्यवस्था देर-सवेर ज़रूर लड़खड़ा जाएगी.

भारत की कुख्यात लालफ़ीताशाही और राजनीतिक खींचातानियों को देखकर यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि देश की अर्थव्यवस्था की नींव ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है.

कृषि में तकनीक बढ़े

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उदाहरण के लिए, वर्ल्ड बैंक के आकलन के अनुसार भारत में कोई भी परियोजना या व्यापार शुरू करने के लिए औसतन 12 औपचारिकताएं और एक महीने का समय लगता है.

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की 144 देशों की रैंकिंग में इस मापदंड में भारत तकरीबन सभी देशों से पीछे है.

एक और बड़ी खामी यह है कि भारत की विशाल जनसंख्या के बावजूद विभिन्न क्षेत्रों में कर्मियों की संख्या में बहुत असमानताएँ हैं.

लगभग हर कृषि-प्रधान देश धीरे-धीरे अन्य उद्योगों और उत्पादन-प्रधान अर्थव्यवस्था की ओर अग्रशील होता है.

यह प्रक्रिया बढ़ती जनसंख्या और तकनीकी विकास की देन है. भारत की पहली समस्या यह है कि वह खेती पर निर्भर देश की 54 प्रतिशत जनता को पिछले कई दशकों से पर्याप्त संरचनात्मक सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाया.

यही वजह है कि देश की आधी से ज़्यादा आबादी का सकल घरेलू उत्पाद में सिर्फ़ 14 फीसदी योगदान है.

दूसरी तरफ, कम आय से परेशान और नए उद्यमों की ओर आकर्षित युवाओं को पर्याप्त शिक्षा और प्रशिक्षण मुहैया नहीं हो पा रहा है, इस कारण नए उद्योगों को सक्षम इंजीनियर, मैकेनिक, आदि नहीं मिलते.

बुनियादी सुविधाओं की कमी

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बिजली, पानी, और औद्योगिक ऊर्जा जैसी बुनियादी चीज़ें भारत में वैसे भी विकट समस्याएँ हैं और नई परियोजनाओं को शुरू करने में बड़ी बाधा बनती हैं.

भारत के पास काम करने वालों की कमी नहीं है, लेकिन उनको खपाने और उनका लाभ उठाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं.

नतीजतन श्रम-सक्षमता के आंकड़े में भारत 144 देशों में 121वें स्थान पर है. यह विसंगति देश में आय असमानता और अमीर-गरीब के बीच लगातार चौड़ी होती खाई का भी कारण है.

नरेंद्र मोदी से आशाएं हैं कि वे ‘अच्छे दिनों’ को जल्दी ही ले आएंगे. गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने प्रदेश में विकास की दिशा में बहुत कार्य किए, किन्तु पूरे देश की अर्थव्यवस्था के ढांचे को बदलना इतना आसान नहीं होगा.

सिर्फ़ नई योजनाएं बनाना काफी नहीं, उनको लागू करने के लिए इन मूल समस्याओं पर ध्यान देना ज़्यादा ज़रूरी है.

निवेशकों में उत्साह

केंद्र में सरकार बदलने के बाद निवेशकों के उत्साह के कुछ संकेत दिखाई देने लगे हैं.

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शेयर बाज़ार का संवेदी सूचकांक सेंसेक्स नई ऊंचाइयों को छू रहा है, लेकिन यह याद रखना होगा कि विदेशी निवेश, जो इस बढ़ोत्तरी का एक बड़ा कारण है, अमरीका और यूरोप के विकसित देशों की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है.

अभी उन देशों की मौद्रिक नीति नरम है और ब्याज दरें बहुत कम, जिस कारण निवेशकों और उपभोक्ताओं दोनों को पैसा आसानी से उपलब्ध है.

जैसे-जैसे विश्व इस लंबी आर्थिक मंदी के दौर से उबरेगा, विकसित देशों में ब्याज दरें बढ़ेंगी. उस समय निवेशक निश्चय ही भारत की मूल कमजोरियों पर ज़्यादा ध्यान देंगे.

सतही तौर पर भारत अपने निजी आर्थिक संकट से निकलता लगता है, लेकिन देश की विकास क्षमता और स्थिरता की असली परीक्षा अभी बाकी है.

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