क्या मुमकिन है भारत में स्मार्ट सिटी?

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भारत ने पिछले चुनावों में विकास के वायदे पर वोट दिया है. स्मार्ट सिटी का जुमला उनमें प्रमुख है.

नई सरकार देश में सौ स्मार्ट सिटी बनाने का इरादा रखती है. स्मार्ट सिटी का मतलब हर किसी के लिए अलग है. वे पांच-सात बातें कौन सी हैं जो हिंदुस्तान के शहर को स्मार्ट होने का ख़िताब दे सकती हैं.

एक दुःस्वप्न की तरह भारतीय शहर भयानक बेतरतीब हैं, जहां आमतौर पर धक्कामुक्की, वारदातें, ट्रैफिक जाम में फंसी एम्बुलेंस की चीत्कार, बिजली-पानी की कटौती, सड़क पर पसरे-जुगाली करते कभी भी बिदक जाने वाले सांड, हर पल मंहगी होती जाती वर्ग फुट की जमीन, अतिक्रमण और बिना किसी योजना के उग आई बस्तियां, पान खाकर थूकते लोग और मौसम बदलते ही स्वाइन फ्लू या डेंगू जैसी बीमारियां हमारी स्मृति का कोलाज बनाती हैं.

स्मार्ट सिटी के जो तमगे सिंगापुर या क्योतो या वेनिस को दिये गये हैं, वे हिंदुस्तान में लागू हो सकते हैं ये अपने आपमें एक बड़े सवाल के साथ है.

किसका स्मार्ट सिटी?

ये सवाल भी छोटा नहीं है कि ये प्रयोजन लोगों के लिए है या नागरिकों के लिए? आम लोगों के लिए या ख़ास लोगों के लिए? गेटेड कम्यूनिटी में रहने वालों के लिए या फिर सबके लिए? अंग्रेजों के जाने के बाद चंडीगढ़ जैसे दो एक उदाहरणों को छोड़ दें, जो भारत में शहरों का नियोजित विकास कम ही देखने को मिलता है.

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क्या स्मार्ट सिटी का जुमला थोड़ी दूर की कौड़ी है, जहां वर्तमान में शौचालयों की संख्या तक नाकाफी है?

बीबीसी हिंदी के रिपोर्टर तुषार बनर्जी ने पड़ताल की है उन कसौटियों की जिनपर स्मार्ट सिटीज को कसा जाना चाहिए. उसकी परिभाषा क्या है और भारत में स्मार्ट सिटी बनाने का अर्थात क्या होगा?

प्रधानमंत्री जिस बनारस को स्मार्ट बनाने की बात कर रहे हैं, वह ईसापूर्व 11वीं या 12वीं शती के इस शहर को किस तरह से बदल कर रख देगा?

सिरीज़ में ख़ास

इस विशेष श्रृंखला में हम महत्वपूर्ण वास्तुविद और टाऊनप्लानर्स की बातें सामने लेकर आएंगे जिनमें क्रिस्टोफर बैनिंजर और गौतम भाटिया जैसे लोग शामिल हैं जो शहरों और उनके विकास के बारे में लम्बे अरसे से विचारते रहे हैं. और साथ में वे सरोकार भी, जो स्मार्ट सिटी को ख़ालिस भारतीय कसौटियों पर कसेंगे.

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इनमें मंजुल के वे कार्टून भी शामिल हैं, जो ठेठ हिंदुस्तानियत और एक विश्व स्तर के सपने के बीच अपनी लकीर खींच रहे हैं.

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