निर्भया से 40 साल पहले एक थी मथुरा

  • 18 सितंबर 2014
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महाराष्ट्र के चन्द्रपुर जिले के नवरगाँव में रहने वाली आदिवासी महिला मथुरा भारत में बलात्कार के क़ानून में बदलाव के लिए हुए पहले आंदोलन का कारण बनीं थीं.

1972 में महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में दो कॉन्स्टेबलों पर मथुरा के साथ थाने में ही बलात्कार करने का आरोप लगा था. इस केस के बाद 80 के दशक में महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन हिंसा के विरोध में देशव्यापी आंदोलन हुए.

इन आंदोलनों के चलते ही 1983 में भारतीय दंड संहिता में बदलाव कर बलात्कार की धारा 376 में चार उपधाराएं ए, बी, सी और डी जोड़कर हिरासत में बलात्कार के लिए सज़ा का प्रावधान किया गया.

बंद कमरे में अदालती सुनवाई की व्यवस्था हुई. इतने क्रांतिकारी बदलाव का कारण रही मथुरा आज भुला दी गई है.

संजीव चंदन की रिपोर्ट

मथुरा: एक सवाल एक जवाब

दिल्ली की निर्भया की त्रासदी से आंदोलित नई पीढ़ी को मथुरा की कोई जानकारी नहीं है. वह इससे भी बेसुध है कि वह किस हाल पर छोड़ दी गई.

चंद्रपुर की पत्रकार शाहिदा शेख़ कहती है, "मेरे जैसे थोड़े जागरूक लोगों को भी मथुरा की कोई जानकारी नहीं थी. मैंने एडवोकेट अरविंद जैन की किताब 'औरत होने की सज़ा' पढ़ने के बाद जाना कि वह चंद्रपुर की रहने वाली हैं."

मथुरा के मामले में पहले तो पुलिस केस ही दर्ज नहीं कर रही थी, स्थानीय लोगों के हंगामे के बाद थाने में केस तो दर्ज हुआ.

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लेकिन 1974 में निचली अदालत ने दोनों अभियुक्तों को इस आधार पर छोड़ दिया कि मथुरा को 'सेक्स की आदत' थी और उसके शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं थे. इतना ही नहीं उसने विरोध या किसी तरह का शोर नहीं किया था.

मथुरा के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने निचली अदालत के निर्णय को इस आधार पर खारिज कर दिया कि थाना परिसर में पुलिस के कॉन्स्टेबल के द्वारा डरा कर किया गया बलात्कार सहमति के साथ संबंध नहीं हो सकता.

लेकिन 1979 में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को फिर से बहाल कर दिया और अभियुक्तों को दोषमुक्त कर दिया. अभियुक्तों की ओर से वकील थे प्रसिद्ध एडवोकेट राम जेठमलानी.

इसके बाद देशव्यापी महिला आंदोलन शुरू हुए और 1983 में भारत सरकार को बलात्कार क़ानून को और संवेदनशील बनाना पडा.

किस हाल में है मथुरा

तब की 16 साल की मथुरा अब लगभग 60 साल की हो चली है. अभी दो किशोर बच्चों की मां मथुरा चंद्रपुर के नवरगाँव में अपने पति और बच्चों के साथ बदहाल स्थिति में रहती है. वह बकरियाँ चराती है और मजदूरी करती हैं.

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हमारे वहां पहुँचने पर उनके पति ने कहा, "अब हंगामे से क्या फ़ायदा होगा. हमारी बदहाली का कोई इलाज है क्या!"

उसका छोटा बेटा गुस्से से लाल घर में दाखिल हुआ. वह नहीं चाहता कि उसकी मां का तमाशा बने.

मथुरा कहती है, "मुझसे कभी कोई मिलने नहीं आया. शुरू में एक मंत्री आई थी. कोई आता है और मेरा तमाशा बनाना चाहता है. मेरी गरीबी का कोई नहीं सोचता. मुझे एक महिला 500 रुपये देकर फोटो खींचना चाह रही थी, मैंने भगा दिया."

महिला आंदोलन पर सवाल

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मथुरा की बदहाली और उसे भुला दिए जाने की एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी लोग महिला आंदोलनों पर भी डालते हैं.

लेकिन सत्यशोधक समाज की नूतन मालवी कहती हैं, "महिला आंदोलन के प्रयासों को एक सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता, मथुरा की घटना और उसकी उपेक्षा से यह जरूर तय होता है कि गांवों में रहने वाली एक आदिवासी या दलित महिला उनके लिए सिर्फ मुद्दा भर होती है."

चंद्रपुर, मुम्बई या दिल्ली आने-जाने के प्रति उदासीन मथुरा के दो किशोर बच्चे हैं, एक दसवीं फेल और एक आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ चुका है.

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