हुसैन को था हिंदू देवी-देवताओं से प्यार?

  • 17 सितंबर 2014
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17 सितबंर मक़बूल फ़िदा हुसैन का 97वां जन्मदिन है लेकिन लगता है बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हुसैन का विरोध उनके मरने के बाद भी जारी है.

कुछ दिनों पहले हुसैन का बनाया गया गणेश का एक चित्र मुंबई के एक नामी होटल में चल रही एक प्रदर्शनी से हटा दिया गया.

इस चित्र में गणेश को एक महिला के साथ चित्रित किया गया था.

प्रदर्शनी का आयोजन कर रहे दिल्ली आर्ट्स गैलरी से जुड़े किशोर सिंह कहते हैं, "कुछ लोगों ने गणेश चतुर्थी के समय हुसैन के बनाए गणेश के इस चित्र को लगाने पर चिंता ज़ाहिर की. दूसरे चित्रों की सुरक्षा के मद्देनज़र हमने हुसैन के ही दूसरे चित्र से इसे बदल दिया है."

हिंदू देवी-देवता और हुसैन

हिंदू देवी-देवताओं के अपने चित्रों के लिए हुसैन ने मरते दम तक विरोध झेला.

सफ़दर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट से जुड़े राम रहमान के मुताबिक़ हुसैन के काम पर हुए हमले राजनीतिक हमले हैं.

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वह कहते हैं, "हुसैन से ज़यादा भड़काऊ चित्र कई हिंदू कलाकारों ने बनाए हैं. उन्हें सिर्फ़ उनके नाम के कारण निशाना बनाया गया है."

देश भर के मंदिरों में मिलने वाले उमा-महेश्वर के शिल्पों का उदाहरण देते हुए रहमान कहते हैं, "इन सबमें पार्वती के स्तन पर कपड़ा नहीं होता पर दक्षिणपंथी कट्टरवादियों को ताउम्र सिर्फ हुसैन से ही दिक्कत रही है."

2008 में तहलका पत्रिका को दिए साक्षात्कार में हुसैन ने अपनी निजी ज़िंदगी के बारे में कई बातें बताईं.

उन्होंने बताया कि किस तरह 'अपनी माँ के देहांत और पंढरपुर से दूर इंदौर भेजे जाने के कारण उन्हें बुरे सपने आते थे. 19 वर्ष की उम्र में दो वर्ष तक उन्होंने गीता, उपनिषद, पुराण एवं अन्य आध्यात्मिक किताबें पढ़ीं जिनसे उन्हें आराम मिला.'

उन्होंने बताया कि उन्होंने गणेश के सौ से ज़्यादा चित्र बनाए होंगे और वह हर बड़े काम की शुरुआत से पहले गणेश का चित्र बनाते हैं.

सभ्यता की नींव

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उन्होंने अपनी बेटी रईसा की शादी के निमंत्रण पत्र पर शिव-पार्वती का चित्र बनवाया था.

लेखक और चित्रकार अशोक वाजपेयी कहते हैं, "हुसैन बख़ूबी समझते थे कि महाभारत और रामायण भारतीय सभ्यता की नींव हैं और वह इकलौते ऐसे चित्रकार हैं जिन्होंने रामायण-महाभारत के ऊपर चित्रों की एक शृंखला की."

इसके लिए हुसैन ने पंडितों के सानिध्य में रहकर वाल्मीकि और तुलसीदास रामायण का गहन अध्ययन किया था.

कला समीक्षक सदानंद मेनन कला पर सेंसरशिप के मुद्दे को बेहद चिंताजनक मानते हैं.

वह आयोजकों के बर्ताव को 'बेवकूफ़ी' क़रार देते हुए कहते हैं, "दोनों ही बड़े संस्थान हैं, और उन्हें इस तरह झुकना नहीं चाहिए था. होटल को प्रदर्शनी की सुरक्षा की पूरी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए थी."

सदानंद मेनन के मुताबिक ये ज़रूरी है कि दूसरे कलाकार आयोजकों का कुछ समय के लिए बहिष्कार करें, मगर उनमें भी एकता की कमी रही है.

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