उपचुनाव से मिले बीजेपी को छह सबक

इमेज कॉपीरइट AP

देश के अलग अलग राज्य में हुए उपचुनाव के नतीजों से केंद्र में बहुमत से सरकार बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी को करारा झटका लगा है.

जिन 32 सीटों पर उपचुनाव हुए उनमें 24 भारतीय जनता पार्टी के पास थीं. पार्टी ने इनमें से आधी से ज्यादा सीटें गंवा दीं. वह भी तब जब मीडिया मोदी सरकार के सौ दिन पूरे होने का जश्न मना रहा था.

ऐसे में उपचुनाव के परिणाम से भारतीय जनता पार्टी को कोई सबक लेना चाहिए या नहीं. वो कौन-कौन से सबक हैं, जो भारतीय जनता पार्टी को सीखने होंगे.

वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ ने बीजेपी को चुनाव परिणाम के आइने में छह सबक दिए हैं.

साईनाथ के सबक, विस्तार से

इन उपचुनाव के परिणामों से बहुत कुछ का अंदाजा नहीं लगाना चाहिए, लेकिन राजनीतिक तौर पर जो अंदाजे मिल रहे हैं, उसे आंकना चाहिए.

एक महीने के अंदर महाराष्ट्र में होने वाले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी-शिवसेना के जीतने की संभावना है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी को उपचुनाव के नतीजों से कोई सबक नहीं लेना चाहिए.

इमेज कॉपीरइट yogiadityanath.in

पहला सबक: ऐसा लग रहा है कि थोड़े ही समय में भारतीय जनता पार्टी ने अल्पसंख्यकों के बड़े तबकेके मन में डर पैदा कर दिया है. नरेंद्र मोदी भले विकास पुरुष के तौर पर देखे जाते हों लेकिन अमित शाह, गिरिराज सिंह और भाजपा का खुल कर समर्थन करने वाले बाबा रामदेव इत्यादि लगातार सांप्रदायिक बयान देते रहे हैं.

2014 के लोकसभा चुनाव में अल्पसंख्यकों का मत विभाजित था. लेकिन इस बार अल्पसंख्यकों ने भारतीय जनता पार्टी से अलग सबसे बड़ी पार्टी को मत दिया है असम, राजस्थान, और उत्तर प्रदेश में.

पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने जरूर खाता खोल लिया है. लेकिन बशीरहाट (दक्षिण) में पार्टी को जीत मिली है, उसकी भी दिलचस्प तस्वीर है. बशीरहाट वो इलाका है जहां मई में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने काफी ज्यादा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया था.

लोकसभा के दौरान बीजेपी को इस इलाके में तृणमूल कांग्रेस पर 30 हज़ार से ज़्यादा मतों की बढ़त हासिल हुई थी. उपचुनाव में पार्टी महज 1700 वोटों से जीती है.

दूसरा सबक: आम तौर पर बीजेपी कांग्रेस से जल्दी आम लोगों से दूर जाती रही है. इस उपचुनाव के परिणाम से पहले उत्तराखंड के उपचुनाव में तीन सीटों पर उसे हार का सामना करना पड़ा था. कर्नाटक और मध्य प्रदेश के उपचुनाव में भी अहम सीटों पर उसे हार मिली. जबकि इन राज्यों में लोकसभा में पार्टी का प्रदर्शन शानदार रहा था.

इमेज कॉपीरइट AFP

तीसरा सबक: अब बीजेपी दिल्ली में चुनाव कराने से बचने की कोशिश करेगी. यह बड़ी समस्या से बचने की कोशिश जैसा ही है.

चौथा सबक: आंकड़े अहम होते हैं. मई में ही मैंने लिखा था कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी के पक्ष में जोरदार लहर दरअसल एंटी-कांग्रेस, एंटी यूपीए लहर है. यही वजह थी कि अलग-अलग राज्यों में एंटी कांग्रेस ताक़त को लोगों ने मत दिया था.

मैंने ये भी तर्क रखा था कि मतों के प्रतिशत का सीटों की संख्या पर असर नहीं पड़ा है. उदाहरण के लिए 2014 में बीजेपी को 31 फ़ीसदी मत मिले और उसने 282 सीटें जीतीं. कांग्रेस को 19.3 फ़ीसदी मत मिले और उसे महज 44 सीटें मिलीं. 2009 के चुनाव में बीजेपी को भी 19 फ़ीसदी के आस-पास मत मिले थे, लेकिन उसे 116 सीटें मिली थीं.

इस बार मायावती की बीएसपी ने उत्तर प्रदेश उपचुनाव में हिस्सा नहीं लिया. इससे समाजवादी पार्टी को काफी फ़ायदा हुआ.

इमेज कॉपीरइट PTI

पांचवां सबक: मीडिया और विश्लेषकों ने चुनाव में जाति के असर को ख़ारिज कर दिया था. लेकिन इसका असर अब भी बना हुआ है.

छठा सबक: मीडिया को इस नतीजे की उम्मीद नहीं थी. मीडिया के मुताबिक मोदी का जादू छाया हुआ था. यहां तक कि मीडिया ने अमित शाह को भी ऐसे पेश किया मानो वे चुनाव अभियान में जादू करने वाले नेता हैं. ऐसा इस बार भी हुआ, लेकिन वो जादू मीडिया की उम्मीद के मुताबिक नहीं था.

उपचुनाव के सबक चुनावी से ज्यादा राजनीतिक हैं. बीजेपी को महाराष्ट्र में सात्वंना मिलेगी लेकिन देश भर की तस्वीर के संकेत तो इन उपचुनाव परिणामों से ही मिलते हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार