‘पहले टॉयलेट बनाइए, फिर स्मार्ट सिटी’

  • 19 सितंबर 2014
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भारत में जहां आज भी पक्के मकानों में शौचालय नहीं हैं, वहां कुछ शहरों को चुन कर उन पर सरकार का निवेश करना कई सामाजिक कार्यकर्ताओं को खटक रहा है.

बीबीसी हिन्दी से विशेष बातचीत में सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक और भारत में शौचालय क्रांति लाने वाले बिंदेश्वर पाठक कहते हैं कि पहले सरकार को शौचालय बनवाने चाहिए और फिर पैसे बचे तो...स्मार्ट सिटी.

विस्तार से पढ़िए स्मार्ट शहरों पर क्या कहते हैं बिंदेश्वर पाठक

एक ऐसा शहर जहां सारी सुविधाएँ हों, वहां कौन नहीं रहना चाहेगा, स्मार्ट सिटी योजना काफ़ी अच्छी है.

शहरों को सुंदर बनना ही चाहिए. साफ-सुथरे, सारी सुविधाओं से पूर्ण, पर्यावरण की दृष्टि से उपयुक्त शहर बनने ही चाहिए.

इसमें किसी को क्या एतराज़ हो सकता है.

लेकिन इसी का अगर आप दूसरा पहलू देखें तो, हमारे देश के करोड़ों घरों में पक्के शौचालय तक नहीं है.

करोड़ों घर बिन टॉयलेट

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गांवों में ऐसे घरों की संख्या करीब 11 करोड़ 50 लाख हैं, जहां शौचालय नहीं हैं. इन घरों में शौचालय की सुविधा देने का ख़र्च अनुमानतः 22 खरब से 26 खरब रुपए है.

मैं तो यहीं कहूंगा कि पहले सभी घरों में शौचालय बनवा दिए जाएं और फिर अगर पैसे बचे तो स्मार्ट सिटी बनाएं जाएं.

शहरों का विकास तो अच्छी बात है, लेकिन गांवों की ओर भी उतना ही ध्यान देने की ज़रूरत है और उन्हें भी साफ-सुथरा बनाना चाहिए.

(देखिए: स्मार्ट शहरों पर बीबीसी विशेष)

अगर स्मार्ट सिटी की बात की जाएं तो इसके अपने फ़ायदे और नुक़सान हैं.

स्मार्ट सिटी के फ़ायदे और नुकसान

नुक़सान ये है कि शहर का जितना अधिक विकास होगा, उतने ही अधिक पेड़ कटेंगे, 24 घंटे बिजली के लिए परमाणु ऊर्जा का सहारा लेना होगा, जिसके अपने ख़तरे हैं.

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पर अच्छी बात ये भी है एक ख़ूबसूरत शहर किसे रास नहीं आएगा...लेकिन इसके प्रभावों से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता.

निर्माण के दौरान पेड़ न कटें इस बात पर ज़ोर दिया जाना चाहिए, ताकि पर्यावरण संतुलन बना रहे.

लेकिन बड़ी तस्वीर ये है कि दुनिया के कई देशों में पहले से ही स्मार्ट सिटी हैं तो भारत में ये बने तो इसे एक अच्छी पहल ही कहा जाएगा.

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(बीबीसी संवाददाता तुषार बनर्जी से बातचीत पर आधारित)

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