किताब से मेधा पर चैप्टर हटाया जाएगा

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मोदी सरकार के कामकाज का मूल्यांकन तो अभी होना बाक़ी है लेकिन उनके एक मंत्रालय की काम करने की रफ्तार ने कई लोगों को हैरत में डाल दिया है.

मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्रालय के कहने पर नेशनल बुक ट्रस्ट (एनबीटी) ने नर्मदा बचाओ आंदोलन की कार्यकर्ता और आम आदमी पार्टी की नेता मेधा पाटकर को अपनी किताब के एक अध्याय से हटाने का फैसला किया है.

क्या है मामला?

एनबीटी ने 1999 में 'चिल्ड्रन हू मेड इट बिग' नामक किताब छापी थी. यह किताब थांगामणि ने भारत के 12 अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों से बात कर उनके बचपन और जवानी के अनुभवों पर लिखी गई थी.

किताब में आम इंसान से अपने क्षेत्र में मशहूर हुए लोगों की कहानियां शामिल की गई थी. इसमें नानी पालकीवाला, सतीश गुजराल, राहुल बजाज और मेधा पाटकर जैसे लोगों के जीवन के बारे में बताया गया है.

2002 में पहली बार अहमदाबाद की गैर सरकारी संस्था के डायरेक्टर वीके सक्सेना ने एनबीटी के निदेशक से मेधा पाटकर को इस किताब से हटाने के बारे में लिखा था.

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हालांकि उसके बाद कई चिट्ठियां और लिखीं गईं लेकिन 12 वर्षों बाद स्मृति ईरानी ने सक्सेना की बात मान ली.

वीके सक्सेना का आरोप है, "मेरे पास सबूत थे कि मेधा ने भारत के विकास को रोकने के लिए विदेशी पैसा लिया है और मैंने सरकार को लिखा. लेकिन 12 साल किसी ने नहीं सुना."

इस मामले में एनबीटी के डायरेक्टर एमए सिकंदर ने माना कि मेधा पाटकर का अध्याय हटाने की बात सही है लेकिन इस पर आगे कुछ भी कहने से मना कर दिया.

किसकी शह?

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Image caption आशीष नंदी (तस्वीर में) के खिलाफ भी सक्सेना मोर्चा खोल चुके हैं.

वीके सक्सेना की पाटकर की आलोचना नई नहीं है. सक्सेना गुजरात में मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले कई लोगों से लोहा ले चुके हैं.

फिर चाहे सामाजिक कार्यकर्ता मल्लिका साराभाई, सामाजिक चिंतक आशीष नंदी हों या फिर गुजरात लोकायुक्त मामला. इन सभी के खिलाफ सक्सेना की संस्था कोर्ट या पुलिस के पास गई है.

हालांकि एनबीटी की किताब से हटाए जाने पर मेधा पाटकर कहती हैं कि उन्हें इस बात से ज्यादा आश्चर्य नही है.

उन्होंने कहा, "सक्सेना पिछले कई सालों से नर्मदा बचाओं आंदोलन और मेरे खिलाफ बोलते रहे है. एक बार तो उन्होंने यह भी कहा था कि मुझे फांसी दे देनी चाहिए. वे गुजरात सरकार और कुछ उद्योगपतियों के इशारे पर काम कर रहे हैं."

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