मंगल मिशनः निर्णायक पल में क्या हैं उम्मीदें?

इमेज कॉपीरइट AP

बुधवार सुबह जब वैज्ञानिक मंगल ग्रह की कक्षा में मंगलयान को स्थापित करने की कोशिश करेंगे, तो यह भारत के मंगल अभियान का निर्णायक पल होगा.

मंगल की कक्षा में स्थापित करने के लिए यान का एक इंजन चालू कर धीमा किया जाएगा ताकि यान को मंगल की कक्षा में सुरक्षित तरीके से स्थापित किया जा सके.

पिछले कई महीनों से वैज्ञानिक जिस घड़ी का इंतज़ार कर रहे हैं वो आने वाली है.

लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्हें यह सब एक सपने में जीने जैसा लग रहा है और उम्मीद के दबाव से वो चिंतित नहीं हैं.

इस अभियान ने दुनिया भर का ध्यान आकर्षित किया है. इसलिए, भारत के अंतरिक्ष उद्योग में इसकी सफलता के क्या मायने होंगे.

समीर हाशमी की विशेष रिपोर्ट:

Image caption भारत के मंगल अभियान का बजट, नासा के मंगल अभियान के बजट का दसवां हिस्सा है.

पिछले साल नवम्बर में भारत का पहला मंगल अभियान सफलता पूर्वक लॉन्च किया गया था.

और 60 करोड़ किलोमीटर की यात्रा के बाद, लाल ग्रह पर जीवन के संकेत तलाशने निकला यह यान अब मंगल की कक्षा में प्रवेश करने वाला है.

इस अभियान को सफल बनाने के लिए पिछले दस महीनों से 200 वैज्ञानिक रात-दिन काम कर रहे हैं और यान की हर गतिविधि पर नज़रें टिकाए हुए हैं.

अब वे मिशन की सफलता से चंद दिन ही दूर हैं. यह ऐसा समय है जो केवल इन विशेषज्ञों की टीम के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के पूरे अंतरिक्ष उद्योग के लिए अहम साबित होने वाला है.

भारत के मार्स आर्बिटर मिशन (एमओएम) के परियोजना निदेशक एस अरुणन कहते हैं, ''हमें कल की चिंता नहीं करनी चाहिए... हमें यह जानना चाहिए कि तनाव में भी कैसे बढ़ना है...इस परियोजना की मार्फ़त मैं और मेरी टीम के सदस्यों ने तनाव में भी बढ़ना और इससे कुछ पाना सीखा. जब आप इस तरह के अभियान में शामिल होते हैं तो आपके संस्थान की प्रतिष्ठा बढ़ती है. मेरे और मेरी टीम के सदस्यों के लिए यह एक सपने में जीने जैसा है.''

आलोचना

इमेज कॉपीरइट Getty

इस अभियान की लागत 7.3 करोड़ डॉलर (क़रीब 450 करोड़ रुपए) है, जोकि नासा के मंगल अभियान का दसवां हिस्सा है, संयोग से यह चर्चित हॉलीवुड फ़िल्म ग्रैविटी की लागत से भी सस्ता है.

हालांकि आलोचकों का कहना है कि क्या भारत जैसे देश को अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर पैसा खर्च करना चाहिए जहां, कम से कम एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा के नीचे रह रही है.

लेकिन भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के पूर्व मुखिया के कस्तूरीरंगन का कहना है, ''वर्ष 2030 तक भारत, अमरीका और चीन के बाद दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो जाएगी. राष्ट्र को सम्पन्न होना चाहिए लेकिन एक आर्थिक ताकत होने के लिए देश को अन्य क्षेत्रों में भी ताक़तवर होने की ज़रूरत है. चाहे यह कृषि का मामला हो या रणनीतिक क्षमता, राष्ट्रीय सुरक्षा, विकास या नागरिकों के जीवन स्तर का मामला हो. ये सभी चीजें विज्ञान और तकनीक से ही निखरेंगी.''

इमेज कॉपीरइट ISRO

सफल अंतरिक्ष कार्यक्रम से अन्य उद्योगों को भी लाभ मिलने की संभावना है. घरेलू कंपनियां उपग्रह के एंटीना समेत अन्य पुर्जे बना रही हैं, जिनका उपयोग इस अभियान पर नज़र रखने के लिए किया जा रहा है.

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च में वैज्ञानिक मयंक वाहिया कहते हैं, ''रॉकेट प्रक्षेपण में भारत के पास सबसे सस्ती तकनीक है. प्रति ग्राम सेटेलाइट के हिसाब से भारत के उपग्रह सबसे व्यवस्थित हैं.''

अंतरिक्ष उद्योग

इमेज कॉपीरइट AP

वाहिया कहते हैं, ''इसलिए तमाम देशों को हमारी तकनीक न केवल लाभप्रद लगेगी बल्कि यहां से ख़रीद में भी उन्हें लाभ दिखेगा. हमने पहले ही अन्य देशों के लिए आधा दर्जन अभियान चलाए हैं. इनकी संख्या बढ़ेगी और हम इनके लिए उपग्रह का निर्माण करेंगे.''

भारत की महत्वाकांक्षा अंतरिक्ष कार्यक्रमों में अपने प्रतिद्वंद्वी चीन और जापान से आगे निकलने की है.

और इस अभियान का नतीजा जो भी हो, नासा और इसरो मंगल ग्रह के अध्ययन को लेकर साथ काम करने पर पहले ही बातचीत कर रहे हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार