जहां बसती है स्वांग कलाकारों की दुनिया

  • 24 सितंबर 2014
औरंगाबाद जिले के दाउदनगर अनुमंडल के स्वांग कलाकार इमेज कॉपीरइट Other

किसी थाने में बैठे दारोगा जी के हाल की कल्पना करें, जब बिना किसी पूर्व सूचना के उनके सामने गाड़ियों का काफिला आ कर रुके और उसमें से उतरने वाला शख्स सूबे का मुख्यमंत्री हो.

यह घटना बिहार के औरंगाबाद जिले के दाउदनगर अनुमंडल की है.

जहां पसीने से तर दारोगा को उस वक्त बेतहाशा हंसी छूट जाती है, जब उसे पता चलता है कि ये वास्तविक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि उनके ही शहर के कलाकार हैं.

संजीव चंदन की ख़ास रिपोर्ट

आश्विन की दूसरी तारीख

औरंगाबाद जिले का दाउदनगर अनुमंडल में कलाकारों की अपनी एक अलग दुनिया है.

यहां पूरा का पूरा शहर आश्विन महीने की दूसरी तारीख के दौरान (इस साल 15-16 सितम्बर को) तरह-तरह के स्वांग रचता है.

लावणी और झूमर गीत गाते हुए रात-रात भर झूमता है. इस छोटे से शहर में कलाकारों ने तरह-तरह की कलाएं साधी हैं.

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पानी पर घंटो सोये रहने की कला हो या जहरीले बिच्छुओं से डंक मरवाने का करतब.

स्वांग रचाते हुए कोई छिन्न मस्तक हो सकता है तो कोई अपने हाथ पाँव को अलग करता हुआ दिख सकता है.

नंदकिशोर चौधरी पानी पर आधे घंटे बिना तैरे स्थिर सो सकते हैं. चौधरी दाउदनगर के उन तीन कलाकारों में से हैं, जिन्होंने पानी पर स्थिर लेटने की इस कला को साधा है.

पुरानी परंपरा

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स्वांग रचने के उत्सव की शुरुआत का इतिहास वहां के लोक गीतों में दर्ज है, जिसे महाराष्ट्र के लोकगीत लावणी को मगही में गाते हुए अपने झूमर गीतों में वे व्यक्त करते हैं.

उनके गीतों के अनुसार 1860 में कभी इस इलाके में महामारी फैली थी. किवदंती है कि उस वक्त लोगों ने पूजा पाठ करके अपनी जान बचाई थी.

पेशे से शिक्षक और स्वांग कला में निपुण अरुण श्रीवास्तव कहते हैं, "पूजा पाठ के बहाने स्थानीय नागरिकों को महामारी से लड़ने के लिए साफ़ सफाई और अन्य स्वास्थ्य विधियों को अपनाया होगा. रात-रात भर जागने के लिए मनोरंजन के तौर पर नक़ल और स्वांग की परंपरा तभी से शुरू हुई होगी."

मराठी परंपरा का बिहारी पाठ

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ब्रिटिश कालीन गज़ेटियर के अनुसार 1860 के आस-पास का समय विभिन्न महामारियों का समय है.

इन बीमारियों से निपटने के लिए ब्रिटिश सरकार उस वक्त स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने पर काम किया था.

लावणी में सामाजिक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व की गाथाएं गाई जाती हैं.

सोण नदी पर बने नहर का वर्णन एक लावणी में दर्ज है कि कैसे अंग्रेजों ने जनता के लिए नहर खुदवाई थी.

भाषाई संकीर्णता को यह बिहार के दाउदनगर का अपना जवाब है. यह 19वीं शताब्दी से चली आ रही मराठी संस्कृति को अबाध रूप से जी रहा है.

इतिहास और वर्तमान

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दाउदनगर के वासी इसे वाणभट्ट का भी शहर बताते हैं.

कादम्बरी के रचनाकार वाणभट्ट को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने 'वाणभट्ट की आत्मकथा' में नाट्य विधा में निपुण बताया है.

स्वांग रचाता यह शहर कई वाणभट्टों का शहर प्रतीत होता है. कला उनके लिए आय का साधन नहीं है.

अलग-अलग पेशों से जुड़े दाउद नगरवासी कला के संधान में लगे हैं. क्या डाक्टर, क्या इंजीनियर या प्राध्यापक, सब के सब स्वांग रचने के पर्व में शामिल होते हैं.

सामुदायिक सौहार्द

कला को समर्पित इस शहर में सामुदायिक सौहार्द के कई उदहारण हैं.

जीतिया पर्व के दौरान जहाँ शहर के मुसलमान भी स्वांग रचते हैं, वहीँ मुसलमानों के त्योहारों में हिन्दू कलाकारों की भागीदारी बढ़-चढ़ कर होती है.

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