क्यों हारे घोषाल और कोरिया की मोबाइल पीढ़ी

  • नौरिस प्रीतम, वरिष्ठ खेल पत्रकार
  • इंचियोन से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

बड़े खेल मेलों में अक्सर विदेशी खिलाड़ी, पत्रकार और बाहर से आए मेहमानों को कुछ ना कुछ परेशानी होती है और वो अक्सर शिकायत करते रहते हैं.

लेकिन अगर मेज़बान देश के खिलाड़ियों को अपनी ही ऑर्गनइजिंग कमेटी से शिकायत हो तो क्या किया जाए? कुछ कोरियाई खिलाडियों को अपनी इवेंट मिस करनी पडी क्योंकि ऑफिशियल बस उन्हें बिना लिए ही स्टेडियम चली गई! हद तो तब हुई जब कोरियाई दल ने प्रेस सेंटर में एक प्रेस कांफ्रेंस करके अपने दिल के गुबार निकाले.

जहां इतनी परेशानी है वहाँ कम से कम एक चीज़ तो अच्छी है. शूटिंग रेंज में रास्तो में जगह जगह फर्श पर एक साथ लिखा है 'वीआईपी और एथलीट'. अक्सर यह दोनों कभी नहीं मिलते. इंचियोन कम से कम फर्श पर ही सही मिले तो हैं. फिर भी वीआईपी तो वीआईपी ही होता है.

शेख साहब का कमाल

मंगलवार को जब पुरुषों की स्क्वॉश का फाइनल चल रहा था तो ओलम्पिक कौंसिल ऑफ़ एशिया के अध्यक्ष और अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक महासंघ के सदस्य कुवैत के शेख अहमद अल सबह हॉल में पहुंचे.

उस वक़्त भारत के सौरव घोषाल 2 गेम जीतकर निर्णायक तीसरे गेम में अपने कुवैती प्रतिद्वंदी अब्दुल्लाह से गोल्ड जीतने की तैयारी कर रहे थे. लेकिन बहुत ही रोमांचक मैच को बीच में ही रोक कर शेख साहब को बाइज़्ज़त हाल में बिठाया गया.

और शायद शेख साहब की ही मौजूदगी थी जिसकी वजह से कुवैत के अब्दुल्लाह ने पासा पलट कर गोल्ड पर कब्ज़ा किया. अब इसे घोषाल की बदकिस्मती कहें या अब्दुल्लाह की खुशक़िस्मती.

बिंदास हुए बिंद्रा?

अक्सर चुप और गंभीर रहने वाले अभिनव बिंद्रा के स्वभाव में इंचियोन में एक बड़ा बदलाव देखा गया है.

आजकल वो पहले आकर हैलो बोल रहे हैं और जब उन्हें 2 मेडल सेरेमनी में मेडलों के साथ 2 फूलों के गुलदस्ते मिले तो उन्होंने बड़े प्यार से दो भारतीय महिला पत्रकारों को दे दिया.

अब यह नहीं पता की यह रिटायरमेंट का असर है या इंचियोन की हवा का.

मोबाइल पीढ़ी

लेकिन अगर बिंद्रा में यह बदलाव इंचियोन की हवा का असर है तो समझ में नहीं आता की यहाँ कोरियाई युवा लोगों को इसका असर क्यों नहीं होता.

लैंड ऑफ़ द मॉर्निंग काम वाले इस देश में हर कोई दिन भर ही 'काम' पर रहता है. जिसे देखो वो मोबाईल पर लगा रहता है- खास तौर से युवा.

भरी लोकल मेट्रो ट्रैन में भी बिलकुल सन्नाटा रहता है. मोबाइल पर गेम या म्यूजिक में मस्त रहते हैं लोग.

खाने का इंतज़ाम

जुगाड़ के लिए जाने वाले भारतीय कहीं पर भी कुछ ना कुछ करके अपना रास्ता तालाश ही लेते हैं. ऐसा ही कुछ किया है इंचियोन आए भारतीय पत्रकारों ने.

तीन चार दिन परेशान रहने के बाद शाकाहारी भारतीय पत्रकारों ने मुख्य प्रेस सेंटर के पास एक मैकडोनाल्ड रेस्टोरेंट में अपना बेहतरीन इंतज़ाम किया है.

वैसे तो यहाँ वेजेटेरियन बर्गर नहीं मिलता लेकिन भारतीय पत्रकार मैकडोनाल्ड में जाकर अपने आप बन के बीच में टमाटर और चीज़ का स्लाइस रख कर मज़े से खा रहे हैं.

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