पीएसएलवी से कहीं भी पहुंच सकते हैं : काले

  • पीपी काले
  • पूर्व निदेशक,विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, इसरो

मंगलयान की सफलता निश्चित रूप से भारत के लिए अद्भुत क्षण है, क्योंकि जैसा कार्यक्रम उसके लिए निर्धारित किया गया था, उसी के मुताबिक 24 सितंबर को वह मंगल की कक्षा में पहुँचा है. अब वह वहां अपना काम शुरू करेगा.

जिस तरह चंद्रयान भेजने में पहले ही प्रयास में हमें सफलता मिली थी, उसी तरह हमें मंगल पर मंगलयान भेजने में हमें पहले ही प्रयास में सफलता मिली है.

मंगलयान को जिस पीएसएलवी रॉकेट यानी पोलर सेटेलाइट लॉच विहेकिल से मंगल पर भेजा गया, वह मेरे ही कार्यकाल में 1994 में सफल हुआ था. यह देखकर मुझे बहुत खुशी हो रही है कि जो काम मैंने शुरू किया था, उसे अब भी आगे बढ़ाया जा रहा है. मुझे उम्मीद है कि यह काम आगे भी जारी रहेगा.

पीएसएलवी का सफ़र

यहां तक हमें पहुँचने के लिए हमें बहुत कठिन मेहनत करनी पड़ी. हमने चंद्रयान को जिस पीएसएलवी रॉकेट से उसे भेजा था और जिस रॉकेट से मंगलयान को भेजा है, उन दोनों का नंबर सी-25 है.

पीसएलवी के पहले प्रक्षेपण को छोड़कर सभी प्रक्षेपण सफल रहे हैं. पहले परिक्षण की असफलता के बाद उसकी कमियों का सुधारा गया.

आज पीएसएलवी सबसे ज्यादा भरोसेमंद प्रक्षेपण यान बन गया है. इसके उपयोग से हम पृथ्वी, चंद्रमा और अब मंगल पर भी जा सकते हैं.

पीएसएलवीसे ही हमने कई अंतरिक्ष यानों को उनकी कक्षा में पहुंचाया है.

पीएसएलवी से भी बड़ा यान है जीएसएलवी हमनें जनवरी 1994 में पहली बार स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन बनाया और जीएसएलवी का विकास किया, जिससे उपग्रह आज अंतरिक्ष में भेजे जा रहे हैं.

स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन

क्रायोजनिक इंजन का उपयोग बहुत भारी संचार उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने में किया जाता है, जिन्हें 14-15 साल तक पृथ्वी की कक्षा में रहना होता है.

वहीं अब किसी और ग्रह पर जाने के लिए हम पीएसएलवी का इस्तेमाल कभी भी कर सकते हैं. लेकिन अगर हमें इंसान को अंतरिक्ष में भेजना है तो हमे पीएसएलवी और जीएसएलवी से आगे जाकर सोचना होगा.

मंगलयान की इस सफलता के बाद भारत एशियाई देशों में काफी निकल गया है.

मंगलयान पर लगे उपकरण मंगल पर मिथेन का पता लगा लेते हैं तो, उसके आधार पर वैज्ञानिक यह पता लगा सकते हैं कि मंगल पर पहले जीवन पहले था या अब वहाँ है या नहीं.

(बीबीसी संवाददाता मोहन लाल शर्मा से हुई बातचीत पर आधारित)

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