जयललिता: एक मुक़दमा, 18 साल, 15 पेंच

  • 27 सितंबर 2014
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बंगलौर की एक विशेष अदालत तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता की आय से अधिक संपत्ति के मामले में शनिवार को अपना फ़ैसला देने वाली है.

जयललिता के ऊपर 18 साल पहले आय से अधिक संपत्ति के मामलों में एफ़आईआर दर्ज की गई थी.

यह मामला तब दर्ज हुआ था जब वो पहली बार मुख्यमंत्री बनी थीं. अब वो तीसरी बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री हैं.

लोकसभा में उनकी पार्टी के 37 सदस्य हैं. यह मुक़दमा अपने मुख्य आरोपों से ज़्यादा इस बात पर चर्चा में रहा कि इसे कैसे और कहाँ चलाया जाए.

जयललिता भ्रष्टाचार के मामले में पहले भी एक बार पद से इस्तीफ़ा देने को मजबूर हो चुकी हैं. इस मुक़दमे का फ़ैसला जयललिता ही नहीं उनके विरोधियों के भाग्य का भी फ़ैसला करेगा.

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ये हैं इस विवादास्पद मामले के 15 बड़े पेंच जिनकी काट जयललिता को अपना राजनीतिक जीवन बनाए रखने के लिए ढूंढनी ही होगी.

1. आय से अधिक संपत्ति का मामला 18 साल पहले दायर किया गया था.

2. साल 1991 में मुख्यमंत्री बनने के बाद जयललिता ने तीन करोड़ रुपए की संपत्ति घोषित की थी. मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने बस एक रुपए महीना वेतन पर काम किया. उनके ख़िलाफ़ आरोप यह है की उनके पास उनके कार्यकाल की समाप्ति तक 66.6 करोड़ रुपए की संपत्ति कैसे हो गई.

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3. आय से अधिक संपत्ति के मामले में आरोप लगा कि चेन्नई और इसके बढ़ते उपनगरों में उनके पास कई मकान, हैदराबाद में फ़ार्म हाउस, नीलगिरि में चाय बागान, 28 किलो सोना, 800 किलो चांदी, 10500 साड़ियां, 750 जोड़ी जूते, 91 घड़ियां. यह सब रिज़र्व बैंक की बंगलौर शाखा में जमा है. आरोप है कि जयललिता, उनकी क़रीबी साथी शशिकला, उनके दत्तक पुत्र सुधाकरन (जिन्हें उन्होंने बाद में त्याग दिया), शशीकला की भांजी इलावर्सी ने जयललिता के काले धन से 32 कंपनियां शुरू कीं.

4. जयललिता और सभी अभियुक्तों ने आरोपों को ग़लत बताया. जयललिता ने आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया और शशिकला ने दावा किया कि उनके परिवार के व्यापार के बारे में जयललिता को कुछ भी नहीं पता था.

5. मुक़दमा 1997 में शुरू हुआ. साल 2002 में एक दूसरी एफ़आईआर में जयललिता पर लंदन में एक होटल की मालिक होने के आरोप लगाए गए. इस मामले को बाद में लंदन होटल केस के रूप में जाना गया.

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6. मई 2001 में जयललिता दोबारा सत्ता में आईँ. उनके मामलों में एक नया जांच अधिकारी आया जिसने नए सिरे से गवाहों के बयान लिए.

7. सितंबर 2001 में जयललिता की विधानसभा की सदस्यता निरस्त कर दी गई. सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के इस फ़ैसले को बरक़रार रखा. अदालत ने उन्हें कोडईकनाल में प्लेज़ेंट होटल को नियमों के विरुद्ध भवन निर्माण की अनुमति देने का दोषी पाया. उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया और ओ पनीरसेल्वम को अपनी जगह मुख्यमंत्री बना दिया. छह महीने बाद वो उपचुनाव जीत कर फिर मुख्यमंत्री बन गईं.

8. आय से ज़्यादा संपत्ति के मामले में 259 में से 76 गवाहों ने अपने बयान वापस ले लिए पर सरकारी वकील ने उनके ख़िलाफ़ किसी कार्रवाई की अपील नहीं की और जयललिता अदालत में पेश भी नहीं हुईं. अदालत ने उन्हें लिखित उत्तर देने की अनुमति भी दे दी.

9. इसके बाद डीएमके नेता के अंबज़गन सुप्रीम कोर्ट में चले गए और मामले की सुनवाई को तमिलनाडु से बाहर कराने की मांग की. सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई को पड़ोसी राज्य कर्नाटक में भेज दिया और विशेष अदालत भी बना दी.

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10. लंदन होटल केस और आय से अधिक सम्पत्ति के मामले को चार सालों की क़ानूनी लड़ाई के बाद अलग-अलग कर दिया गया.

11. इस बीच 2003- 2005 के बीच बंगलौर अदालत के लिए अदालती दस्तावेज़ों का तमिल से अंग्रेज़ी में अनुवाद होता रहा. पांच साल बाद जयललिता ने तमाम दस्तावेज़ों को रद्द कर नए सिरे से अनुवाद कराने की अपील की जिसे हाई कोर्ट से ठुकरा दिया गया.

12. साल 2011 में जयललिता के वकीलों ने अनुवादों में सुधार की मांग की. साथ ही उन्होंने विशेषज्ञ अनुवादक की भी मांग की ताकि गवाहों के साथ जिरह की जा सके. अदालत ने अनुवादक नियुक्त किया तो जयललिता के वकीलों ने अनुवादक से ही जिरह करने की अनुमति चाही. बाद में उन्होंने अनुवाद में ग़लतियों को सुधरवाने के लिए छह महीने का समय भी माँगा.

13. कभी किसी कारण से कभी किसी कारण से जयललिता के वकील अलग-अलग अदालतों में आवेदन देते रहे.

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14. विशेष अदालत में कार्रवाई रुकवाने के लिए हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कई बार आवेदन लगाए गए. 2013 में विशेष अदालत में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नियुक्त वकील ने अपने ऊपर लगातार डाले जा रहे दबाव की बात करते हुए हुए इस्तीफ़ा दे दिया. कर्नाटक की तात्कालिक भाजपा सरकार ने नया सरकारी वकील नियुक्त कर दिया, बाद की कांग्रेस सरकार ने उस नए वकील को हटाया तो जयललिता अदालत पहुँच गईं और उसी वकील को दोबारा नियुक्त करने की मांग की.

15. जयललिता को इस बीच विशेष अदालत ने ख़ुद हाज़िर होने को कहा ताकि उनसे सवाल जवाब किए जा सकें. वो सुपीम कोर्ट चली गईं जहाँ उनकी बात नहीं सुनी गई. फिर उन्होंने सुरक्षा का सवाल उठाया तो कर्नाटक को विशेष अदालत को दूसरी इमारत में भेजना पड़ा.

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