मीडिया का मोदीमय होना कितना जायज?

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न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वेयर में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण की भारतीय मीडिया ख़ूब सराहना कर रहा है.

सोमवार को अख़बारों की सुर्खियों में मोदी ही मोदी थे.

अख़बारों की हेडलाइंस थीं "मैडिसन स्क्वेयर मोदी पर दीवाना हुआ", "मोदी ने अमरीका को बांधा", "राजनीति के नए रॉकस्टार मोदी".

अधिकतर भारतीय चैनलों ने मोदी के भाषण का सीधा प्रसारण किया और इसके बाद स्टूडियो में भाषण पर चर्चाओं का दौर भी चला.

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ख़बरों के मुताबिक एक घंटे से अधिक के मोदी के भाषण को मैडिसन स्कवेयर में मौजूद भारतीय मूल के लोगों ने खूब सराहा और जमकर तालियां बजाईं.

टीआरपी का चक्कर

लेकिन क्या मीडिया का इतना ज़ोर-शोर से प्रचार करना ठीक है?

इंडियन काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड अफ़ेयर्स के वरिष्ठ विश्लेषक डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन कहते हैं, "मीडिया में भाषण की विवेकपूर्ण रिपोर्टिंग और संतुलित चर्चा का अभाव था."

उन्होंने कहा कि कहा जा सकता है कि टेलीविज़न चैनलों ने टीआरपी के चक्कर में पूरा का पूरा कार्यक्रम दिखा डाला.

वे कहते हैं, "अधिकतर ख़बरिया चैनलों को लगता है कि मोदी ने पूरा देश जीता है और देश का मिज़ाज उनके साथ है. इसलिए स्वाभाविक है कि वे खुद को देश के मूड के साथ जोड़कर चल रहे हैं."

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डॉक्टर हुसैन कहते हैं कि समाचार चैनल वैसे भी रेटिंग के लिए एक-दूसरे के प्रति बेहद आक्रामक होते हैं और यदि एक चैनल मोदी को दिखाकर अच्छी रेटिंग पा लेता है तो दूसरे चैनल उसकी राह चलने लगते हैं.

फिलहाल मोदी लहर

डॉक्टर हुसैन का कहना है कि कई मीडिया कंपनियों को लगता है कि मोदी भारत की छवि सुधार रहे हैं और उनकी मदद करना उनका कर्तव्य है.

तो मोदी के प्रति मीडिया का यह प्रेम कब तक चलता रहेगा?

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विश्लेषकों का कहना है कि लहर अभी मोदी के साथ है और मीडिया सकारात्मक दृष्टि से उनके पीछे चलता रहेगा.

डॉक्टर हुसैन कहते हैं, "मोदी ने बड़े-बड़े वादे किए हैं और अगर वे नतीजे देने में विफल रहे तो इस बात की पूरी संभावना है कि मीडिया उनके भी ख़िलाफ़ हो जाएगा."

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