दलित विधवाएं बनेंगी मंदिर की पुजारी

  • 1 अक्तूबर 2014
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मंगलौर में दो दलित विधवाओं को मंदिर को पुजारी बनाए जाने की घटना को प्रगतिशील लेखकों ने 'क्रांतिकारी' घटना बताया है.

कर्नाटक के इस तटवर्ती शहर के कुदरोली श्री क्षेत्र के गोकर्णनाथ मंदिर की स्थापना 1912 में श्रीनारायण गुरु ने की थी.

ऐसा नहीं है कि इस मंदिर में सुधार की यह पहला क़दम है. इससे पहले, मंदिर के शताब्दी समारोह में पाँच हज़ार विधवाओं को पूजा की अनुमति दी गई थी.

ऐतिहासिक क़दम

'वैदिक संस्कृति' की इन जकड़नों को दूर करने के पीछे जो शख्स हैं उनका नाम है जनार्दन पुजारी.

जनार्दन पुजारी राजीव गाँधी सरकार में वित्त राज्य मंत्री थे और कहते हैं कि बचपन में खुद जातीय भेदभाव का शिकार रहे.

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Image caption 1991 में श्रीनारायण गुरु मंदिर के जीर्णोद्धार के समय मंदिर में विधवाओं को प्रवेश की अनुमति दी गई थी

पुजारी ने बीबीसी को बताया, "मैंने अछूतों की दुर्दशा देखी है, मैंने खुद इसे भुगता है. दक्षिण भारत के बिलावा समुदाय को मंदिरों में नहीं घुसने दिया जाता था. हमें कहा जाता था कि हम ईश्वर की संतान नहीं हैं."

पुजारी ने दलित समुदाय की दो विधवाओं लक्ष्मी (65) और चंद्रवती (46) को पुजारी के काम के लिए चुना है. श्रीनारायण गुरु की शिक्षाओं के मुताबिक उन्हें प्रशिक्षित किया जाएगा.

पुजारी कहते हैं, "वे दलित हैं और विधवा भी. वे ईश्वर की संतान हैं और मैंने महसूस किया कि वे पुजारी बनने के योग्य हैं."

इन दलित विधवाओं के नाम बदलकर अब 'लक्ष्मी शांति' और 'चंद्रवती शांति' हो जाएंगे. उन्हें मुख्य पुजारी 'लक्ष्मण शांति' प्रशिक्षित करेंगे.

सराहना

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इस घटना पर मंदिर के किसी पुजारी की प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी, क्योंकि वो बहुत कम बोलना पसंद करते हैं.

लेकिन, पुजारी के इस क़दम का के मरुलसिदप्पा, इंदुधारा होन्नापुरा जैसे दलित कन्नड़ लेखकों ने स्वागत किया है.

मरुलसिदप्पा कहते हैं, "पुजारी का क़दम क्रांतिकारी है. निचली जाति के लोगों को मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश नहीं करने दिया जाता."

होन्नापुरा कहते हैं, "वैदिक संस्कृति को एक झटका दिया है. इस एक क़दम से शायद जो ब्राह्मण पुजारी बनने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं, उन्हें समझ आएगा कि ये अब खत्म कर दिया गया है. यह बहुत बड़ा क़दम है."

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होन्नापुरा को उम्मीद है कि अन्य जगहों पर भी ऐसा ही होगा, लेकिन मरुलसिदप्पा को इसमें संदेह है.

मरुलसिदप्पा कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि ऐसा दूसरे मंदिरों में भी होगा."

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