'सफ़ाई अभियान' या 'पब्लिसिटी स्टंट'

  • 2 अक्तूबर 2014
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अब तक भारत दो अक्तूबर को राष्ट्रीय अवकाश के तौर पर मनाता रहा है, लेकिन 2014 में ऐसा नहीं हो रहा.

क़रीब चालीस लाख सरकारी कर्मचारी और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों छात्र इस साल दो अक्तूबर को झाड़ू लेकर अपने दफ़्तरों और स्कूलों की सफ़ाई करते नज़र आए. ये लोग अपने परिसरों के शौचालय की सफ़ाई भी करेंगे.

इस मुहिम में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हिस्सा लिया. उन्होंने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सफ़ाई कर्मचारियों की सबसे बड़ी बस्ती वाल्मीकी कॉलोनी से स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की. उनके हाथों में भी झाड़ू थे और उन्होंने थोडी़ देर तक सफ़ाई भी की.

स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में नरेंद्र मोदी ने लाल क़िले से कहा था, "आज़ादी के इतने सालों के बाद भी, क्या हम इस गंदगी में रहना चाहते हैं? क्या हमें इसे दूर नहीं कर सकते हैं?"

पांच साल का लक्ष्य

दो अक्तूबर महात्मा गांधी की जयंती होती है. साफ़ सफ़ाई और स्वच्छता के प्रति गांधी की चाहत सनक की हद तक थी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गांधी जयंती के दिन स्वच्छ भारत अभियान को शुरूआत करते हुए अगले पांच सालों के दौरान देश भर से गंदगी मिटाने का संकल्प लिया है. उनके शब्दों में, "अगले पांच सालों में हमारे गांव, शहर, गलियां, स्कूल, मंदिर और अस्पतालों में कहीं गंदगी नज़र नहीं आएगी."

स्वच्छ भारत अभियान की कामयाबी के लिए सरकार ने कई क़दम उठाए हैं.

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देश के सभी प्रमुख समाचार पत्रों में सरकारी विज्ञापन दिए गए हैं, जिसमें आम लोगों से बड़ी संख्या में बाहर निकल कर इस अभियान से जुड़ने की अपील की गई है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक़ तमाम सरकारी दफ़्तरों में झाड़ू, डस्टर और डस्टबिन बड़े पैमाने पर ख़रीदे गए हैं. लेकिन भारतीय नौकरशाह इस मुहिम से ख़ुश नहीं हैं.

ख़ुश नहीं हैं कर्मचारी

सभी सरकारी कर्मचारियों को गुरुवार सुबह नौ बजे तक दफ़्तर पहुंचने को कहा गया था. इन लोगों को सबसे पहले सफ़ाई की प्रतिज्ञा दिलाई गई कि साल में कम से कम 100 घंटे यानी प्रति सप्ताह दो घंटे सफ़ाई के लिए देने होंगे.

इसके बाद ये सभी झाड़ू लेकर सफ़ाई में जुट गए. सबूत के तौर पर, सफ़ाई के पहले और बाद की तस्वीर ली जाएगी.

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वैसे इस साल शुक्रवार से ही लंबी छुट्टियों वाला सप्ताह शुरू हो रहा है. शुक्रवार से दशहरा की छुट्टी है जबकि सोमवार को ईद है. ऐसे में सभी कर्मचारियों को गुरुवार को दफ़्तर बुलाना कई कर्मचारियों को खटक रहा है.

एक वरिष्ठ नौकरशाह ने बीबीसी को बताया, "कई लोगों ने बहुत पहले ही अपनी छुट्टियां प्लान की हुई थीं. उन लोगों ने एडवांस में फ्लाइट की बुकिंग और ट्रेन के टिकट भी ले लिए थे. लेकिन अब सबकी छुट्टियां रद्द कर दी गई हैं. आप तभी छुट्टी ले सकते हैं जब आपके घर में किसी की मृत्यु हो जाए."

हर घर में शौचालय

सरकार की ओर से कहा गया है कि इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य खुले में शौच के चलन को ख़त्म करना है. देश की आधी आबादी को शौचालय की सुविधा नहीं मिलती.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगले पांच साल के दौरान देश के प्रत्येक स्कूल और प्रत्येक घर में शौचालय का वादा किया है.

इसमें क़रीब 620 अरब रुपये के ख़र्च होने का अनुमान है. सरकार ने इसके लिए अभी 14.60 करोड़ रुपये का बजट रखा है और उसे उम्मीद है कि बाक़ी की रक़म कॉरपोरेट, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अन्य जगहों से जुटा लिए जाएंगे.

लेकिन केवल शौचालय बनाने से भारत बदलेगा नहीं. भारत को दुनिया के सबसे गंदे देशों में गिना जाता है.

पब्लिसिटी स्टंट तो नहीं

दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे हमारे तमाम महानगर गंदगी से बजबजाते नज़र आते हैं. रोजाना टनों में गंदगी गंगा जैसी पवित्र नदियों में प्रवाहित की जा रही हैं.

ज़्यादातर भारतीय गलियों में, पार्कों में गंदगी फैलाने से पहले एक बार भी नहीं सोचते.

तो सवाल यह है कि नौकरशाहों और स्कूली बच्चों से झाड़ू लगवाकर मोदी भारत को स्वच्छ बना देंगे. इस सवाल के जवाब में कई आलोचक कहते हैं, यह क़दम सांकेतिक है या कहें पब्लिसिटी स्टंट से ज़्यादा नहीं.

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हालांकि कईयों को उम्मीद भी है. सिविल सोसायटी पत्रिका के प्रकाशक उमेश आनंद कहते हैं, "यह पब्लिसिटी स्टंट नहीं है, मुझे लगता है कि मोदी वास्तव में देश से गंदगी मिटाना चाहते हैं."

आनंद को भरोसा है कि गुरुवार को टेलीविज़न पर लाखों लोगों को झाड़ू लगाते देख कुछ लोगों पर ही सही, असर तो होगा.

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