'सफ़ाई हमारा काम है, वो अपना काम करें'

  • 2 अक्तूबर 2014
इमेज कॉपीरइट Shailesh Mathur

कमला चांगरा अब उम्र के सात दशक पार कर चुकी हैं. दो बेटों और पांच बेटियों की माँ कमला जब पीछे मुड़ कर देखती हैं तो बीते समय की ''बास''(गंध) उनका पीछा नहीं छोड़ती.

राजस्थान के कुचामन शहर के पास बूटरु गाँव से जयपुर ज़िले के सांभर क़स्बे में वो कम उम्र में ही ब्याह कर आयीं.

अपनी सास की अकेली बहू थीं इसलिए उनकी मदद के लिए जल्दी ही सर पर मैला ढोने के काम में लगना पड़ा.

वो कहती हैं, ''मुझे तो आते ही लगा दिया सास ससुर ने गंदीवाड़ा उठाने के काम में. अपने गाँव में मैंने ऐसा नहीं देखा था. मैं अपने नाक-मुंह पर ''डाटा'' (कसकर कपड़ा बांधना) लगा कर काम करती थीं पर बदबू के मारे माथा चकरा जाता था, उलटी आने लगती थी. घर लौट कर आने पर भी वही बदबू जैसे पीछा करती और रोटी भी नहीं भाती थी.”

इमेज कॉपीरइट Shailesh Mathur

वो कहती हैं, ''बहुत ही परेशानी होती थी, पूरे वक़्त वो ही सब दिखता.''

'सफ़ाई हमारा काम है'

यही कहानी तेली दरवाज़े में रहने वाली उनकी पड़ोसन कमला पवार की भी है. वो कहती हैं, ''शादी के बाद दो तीन साल बिठा कर सास ने इस गंदगी के काम में लगा दिया. पीड़ा तो बहुत ही महसूस हुई. नाक और मुंह पर ख़ूब डाटा लगाकर ही काम कर पाती थी.''

घर के सब लोग यही काम करते थे. अभी दो तीन साल से ही बंद हुआ है.

मज़दूरी के नाम पर आज से पचास साल पहले हर घर से मिलते थे कोई आठ आने और दोनों वक़्त का खाना. दो अक्तूबर से देश में चलाए जा रहे स्वच्छता अभियान के बारे में दोनों को ज़्यादा जानकारी नहीं है.

इमेज कॉपीरइट PTI

पर कमला पवार का मानना है कि “बड़े अफ़सर झाड़ू उठाएँ और ख़ुद सफ़ाई करें, यह ग़लत है. वो अपना काम करें और सफ़ाई कर्मियों को अपना काम करना चाहिए.

वो कहती हैं, "हमारा काम सफ़ाई का है, यह हम करेंगे. वो दफ़्तर संभालें.''

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार