भारत सिखाएगा भ्रष्टाचार मिटाने के तरीके!

भूटान

भूटान में भ्रष्टाचार... कुछ साल पहले तक ये असंभव सा लगता था पर अब ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के 177 भ्रष्टतम देशों की सूची में कम भ्रष्ट देश भूटान (31वां) ने 94 वें स्थान पर काबिज भारत से इस नई चुनौती से निपटने के लिए मदद मांगी है.

ये भी चौंकाने वाली बात लगती है पर सच है कि जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार से निपटने में भारत ने कई नए तरीकों का इस्तेमाल किया है जो सफल भी हुए हैं खास तौर पर सोशल ऑडिट का तरीका जहां गांव और ज़िला स्तर पर जन सुनवाई होती है.

भूटान में भ्रष्टाचार का स्तर अभी वैसा कहीं से नहीं है जैसा भारत में देखने को मिलता है.

वहां ऐेसे मामले सामने आए हैं जो आम तौर पर भारत के गांवों में मिलते हैं जैसे शौचालय के लिए इकट्ठा किया गया पैसा किसी बौद्ध मठ को दे देना.

सिंचाई की एक नहर में खर्च से ज्यादा खर्च दिखलाना.

इस युवा लोकतंत्र में राजनीतिक भ्रष्टाचार अभी नहीं शुरू हुआ है पर छोटे स्तर पर हो रही इन छिटपुट घटनाओं पर रोक लगाने का बीड़ा भूटान की सरकार ने भारत की मदद से उठा लिया है.

पारदर्शिता

यूँ तो भूटान सड़क निर्माण, बिजली आपूर्ति से लेकर प्रखंड कार्यालय तक के निर्माण के लिए भारत से सहयोग लेता रहा है.

लेकिन, पिछले माह भूटान ने पहली बार भारत से भ्रष्टाचार, सामाजिक जवाबदेही और सरकारी काम में पारदर्शिता को बहाल करने के लिए भी सहयोग लिया है.

इस प्रयास को गति देने की जिम्मेवारी दो भारतीय संगठनों मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) और सोसाइटी फॉर सोशल एकाउंटेबिलिटी एंड ट्रांसपेरेंसी (एससैट) को दी गई.

भारतीय संगठनों की अगुआई में छह दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया.

विकेंद्रीकरण

भारतीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल बिहार के कार्यकर्ता आशीष रंजन बताते हैं कि महज छह साल पुराने भूटान के लोकतंत्र में विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया अब शुरू हुई है.

सोशल ऑडिट के जरिए भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और पारदर्शिता बहाल करने के लिए यह समय माकूल था. उनके लिए यह कोशिश बिलकुल नई चीज जैसी थी.

इस कार्यक्रम में राजस्थान से शामिल भंवर मेघवंशी कहते हैं कि वहां के लोगों को यह नहीं पता था कि सरकारी कामों में पारदर्शिता और उसकी जानकारी पाना उनका हक है.

विकास का पैमाना

Image caption भूटान में जीवन के प्रति संतुष्टि के भाव को अधिक तरजीह दी जाती है.

संसाधनों के अभाव के बावजूद इस देश की तरक्की का मानक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) नहीं बल्कि सकल घरेलू खुशी (जीडीएच) है.

देश का जीडीएच कायम रहे इसलिए लोकतंत्र की छोटी आयु में ही वहां भ्रष्टाचार को बड़ा खतरा मानते हुए पहल की गई है.

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